प्रेग्नेंसी में 'साइलेंट किलर' का काम करती है प्री-एक्लेम्पसिया, 20 हफ्ते बाद दिख सकते हैं संकेत
गर्भावस्था में प्री-एक्लेम्पसिया मातृ मृत्यु का तीसरा बड़ा कारण है, जिसे 'साइलेंट किलर' माना जाता है। नियमित जांच और समय ...और पढ़ें

प्रेग्नेंसी में 'साइलेंट किलर' का काम करती है प्री-एक्लेम्पसिया (AI Generated Image)

समय कम है?
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संवाद सहयोगी, किशनगंज। गर्भावस्था के दौरान मां और गर्भस्थ शिशु के स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए नियमित जांच बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। कई बार कुछ गंभीर बीमारियां बिना स्पष्ट लक्षणों के धीरे-धीरे विकसित होते और प्रसव के समय जानलेवा स्थिति पैदा कर देती हैं।
ऐसी ही एक गंभीर समस्या है प्री-एक्लेम्पसिया, जिसे विशेषज्ञ गर्भावस्था का साइलेंट किलर मानते हैं। समय पर पहचान और उपचार नहीं मिलने पर यह बीमारी मां और शिशु दोनों के जीवन को खतरे में डाल सकती है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि नियमित प्रसव पूर्व जांच के माध्यम से इसकी पहचान कर सुरक्षित मातृत्व सुनिश्चित किया जा सकता है।
सिविल सर्जन डॉ. राज कुमार चौधरी ने कहा कि मातृ मृत्यु के प्रमुख कारणों में प्री-एक्लेम्पसिया एक गंभीर चुनौती है। विभिन्न चिकित्सा अध्ययनों के अनुसार, अत्यधिक रक्तस्राव और संक्रमण के बाद मातृ मृत्यु का तीसरा बड़ा कारण प्री-एक्लेम्पसिया है।
यह ऐसी स्थिति है जिसमें गर्भवती महिला का रक्तचाप असामान्य रूप से बढ़ जाता और शरीर के विभिन्न अंग प्रभावित होने लगते हैं। समय पर पहचान और उपचार से अधिकांश मामलों में गंभीर जटिलताओं को रोका जा सकता है।
सदर अस्पताल के उपाधीक्षक डॉ. अनवर हुसैन ने कहा कि प्री-एक्लेम्पसिया की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शुरुआती चरण में इसके लक्षण स्पष्ट नहीं होते। कई गर्भवती महिलाओं को तब तक इसकी जानकारी नहीं मिलती जब तक नियमित जांच में रक्तचाप बढ़ा हुआ नहीं पाया जाता। यही कारण है कि इसे साइलेंट किलर कहा जाता है।
उन्होंने कहा कि गर्भवती महिला को कम से कम चार प्रसव पूर्व जांच अवश्य करानी चाहिए, ताकि उच्च जोखिम वाली गर्भावस्था की पहचान समय रहते हो सके।
महिला चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. रिजवाना तबस्सुम ने कहा कि गर्भावस्था के 20वें सप्ताह के बाद यदि रक्तचाप बढ़ जाए और पेशाब में प्रोटीन की मात्रा मिलने लगे तो यह प्री-एक्लेम्पसिया का संकेत हो सकता है।
इसके अलावा हाथ, पैर और चेहरे पर अत्यधिक सूजन, लगातार सिरदर्द, आंखों के सामने धुंधलापन, चमक दिखाई देना, बेचैनी और पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द जैसे लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं।
उन्होंने बताया कि यदि प्री-एक्लेम्पसिया का समय पर इलाज नहीं कराया जाए तो यह एक्लेंपसिया में बदल सकता है। इस अवस्था में गर्भवती महिला को दौरे पड़ने लगते हैं, मस्तिष्क, किडनी और लीवर प्रभावित हो सकते और कोमा जैसी गंभीर स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
