दुबई में बुझ गया घर का चिराग! 14 दिन बाद भी नहीं पहुंचा मंसूर का शव, जनाजे की तैयारी कर थके परिजनों के छलके आंसू
Kishanganj Youth Dies in Dubai: दुबई में 23 वर्षीय मंसूर आलम की मौत के 14 दिन बाद भी उसका शव ...और पढ़ें

Kishanganj Youth Dies in Dubai: मंसूर आलम फाइल फोटो
HighLights
दुबई में 23 वर्षीय मंसूर आलम की संदिग्ध मौत।
14 दिन बाद भी शव पैतृक गांव नहीं पहुंचा।
परिजन भारतीय दूतावास से शव वापसी की गुहार लगा रहे।
संवाद सूत्र, बहादुरगंज (किशनगंज)। Kishanganj Youth Dies in Dubai: बूढ़े माता-पिता के बुढ़ापे का सहारा बनने और परिवार की तंगहाली दूर करने का सपना लेकर खाड़ी देश दुबई गए 23 वर्षीय मंसूर आलम अब इस दुनिया में नहीं रहा। बीते 5 अक्टूबर को दुबई स्थित अपने कमरे में फंदे से लटकने के कारण उसकी असमय मौत हो गई।
बेटे की मौत की मनहूस खबर मिलते ही बहादुरगंज प्रखंड अंतर्गत बेतबाड़ी गांव में कोहराम मच गया। सबसे दर्दनाक स्थिति यह है कि इस दुखद घटना के 14 दिन बीत जाने के बाद भी बेटे का पार्थिव शरीर पैतृक गांव नहीं पहुंच सका है, जिससे परिजनों की बेचैनी और रो-रोकर आंखें पथरा गई हैं।
कब्रगाह में जनाजे की तैयारी कर थके परिजन
शव आने की सूचना पर गांव के लोगों ने मंसूर को पैतृक गांव के कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-खाक करने की पूरी तैयारी कर ली थी। जनाजा ले जाने के लिए बांस-लकड़ी की व्यवस्था और अन्य पारंपरिक इंतजाम मुकम्मल कर लिए गए थे। लेकिन परदेस में कानूनी प्रक्रियाओं और कागजी औपचारिकताओं में आ रही अड़चनों के कारण शव रवानगी में लगातार देरी होती चली गई।
खोलनी पड़ीं लकड़ियां
14 दिन बाद भी जब शव आने की कोई निश्चित तिथि तय नहीं हो सकी, तो हताश और टूटे हुए परिजनों को जनाजे की तैयारियां खोलकर रखनी पड़ीं। गमगीन माहौल में ग्रामीण पीड़ित परिवार को ढांढ़स बंधा रहे हैं।
बड़े भाई के सहारे कमाने गया था दुबई
बेतबाड़ी गांव निवासी समाजसेवी शाकीर आलम ने बताया कि मौलवी नूरुल हक का छोटा बेटा मंसूर आलम अविवाहित था। वह अपने बड़े भाई मोहम्मद दानिश के सहारे दुबई गया था। दोनों भाई वहां एक ही कंपनी से जुड़कर अलग-अलग स्थानों पर घोड़ों की देखरेख का काम संभाल रहे थे।
5 अक्टूबर को अचानक मंसूर का शव कमरे में फंदे से लटका पाए जाने की सूचना मिली। उसने यह आत्मघाती कदम किन परिस्थितियों में उठाया, इसका खुलासा अब तक नहीं हो सका है।
चार बहनों और वृद्ध माता-पिता पर टूटा दुखों का पहाड़
मंसूर अपने पीछे वृद्ध माता-पिता, बड़े भाई, भाभी और चार बहनों का भरा-पूरा परिवार छोड़ गया है। घर की माली हालत ठीक न होने के कारण परिवार को उससे बहुत उम्मीदें थीं।
परदेस से बेटे की अर्थी आने के इंतजार में मां-बाप का रो-रोकर बुरा हाल है। परिजन अब भारतीय दूतावास और स्थानीय प्रशासन से गुहार लगा रहे हैं कि कागजी औपचारिकताएं जल्द पूरी कराकर मंसूर का शव वतन लाया जाए, ताकि उसे पैतृक मिट्टी में अंतिम विदाई दी जा सके।
