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दूध नहीं पी रहा था नवजात, परिवार ने कमजोरी समझ टाला! किशनगंज में आशा की सजगता से समय पर इलाज, बची जान

Published: Thu, 08 Oct 2026 07:00 AM (IST)

किशनगंज में एक नवजात शिशु की जान आशा कार्यकर्ता की सजगता से बची, जब परिवार ने उसके दूध न पीने और अधिक सोने को सामान्य कमजोरी समझा।

किशनगंज में गृह भ्रमण के दौरान नवजात शिशु के स्वास्थ्य की जांच करती और परिजनों को जागरूक करती आशा कार्यकर्ता

किशनगंज में गृह भ्रमण के दौरान नवजात शिशु के स्वास्थ्य की जांच करती और परिजनों को जागरूक करती आशा कार्यकर्ता

HighLights

  1. किशनगंज में नवजात ने दूध पीना कम किया, परिवार ने कमजोरी समझा।

  2. आशा कार्यकर्ता ने खतरे के लक्षण पहचाने, तुरंत अस्पताल भेजा।

  3. समय पर चिकित्सकीय देखभाल से नवजात की जान बच गई।

संवाद सहयोगी, किशनगंज। जिले के बेलवा बस्ती निवासी राजेश के घर नवजात शिशु के जन्म के बाद चारों ओर खुशियों का माहौल था। हालांकि, प्रसव के कुछ ही दिनों बाद नवजात ने अचानक मां का दूध पीना कम कर दिया और सामान्य से अधिक समय तक सोने लगा।

परिवार इसे नवजात बच्चे की स्वाभाविक कमजोरी मानकर नजरअंदाज कर रहा था। इसी दौरान स्वास्थ्य विभाग के नियमित गृह आधारित नवजात देखभाल (HBNC) कार्यक्रम के तहत राजेश के घर पहुंचीं स्थानीय आशा कार्यकर्ता जोहरा खातून की नजर शिशु पर पड़ी।

उन्होंने बच्चे की गिरती स्थिति को सामान्य न मानकर खतरे के संकेत को तुरंत पहचान लिया और परिजनों को बिना समय गंवाए निकटतम स्वास्थ्य केंद्र ले जाने की सलाह दी। समय पर मिली चिकित्सकीय देखभाल से मासूम की जान बच सकी और उसकी स्थिति में तेजी से सुधार आया।

प्रसव के 42 दिनों तक मां-बच्चे पर कड़ा पहरा, खतरे के लक्षणों पर तुरंत एक्शन

स्वास्थ्य विभाग की नीति के अनुसार प्रसव के बाद शुरुआती 42 दिन मां और नवजात शिशु दोनों के स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से अत्यंत संवेदनशील होते हैं। इस दौरान आशा कार्यकर्ता नियमित अंतराल पर गृह भ्रमण कर धात्री माता के स्वास्थ्य, स्तनपान, बच्चे के तापमान, सांस लेने की गति

और शारीरिक गतिविधियों की बारीकी से निगरानी करती हैं। इसके अलावा परिजनों को व्यक्तिगत स्वच्छता, साबुन से हाथ धोने, गर्भनाल की सफाई और शिशु को गर्म रखने के व्यावहारिक तरीके सिखाए जाते हैं।

शत-प्रतिशत डिजिटलाइजेशन का निर्देश, बीएचएम व बीसीएम को जिम्मेदारी

स्वास्थ्य सेवाओं की मॉनिटरिंग को पारदर्शी और प्रभावी बनाने के लिए जिला विकास अधिकारी (डीडीए) सुमन सिंहा ने कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने जिले भर में आशा कार्यकर्ताओं के सभी रजिस्टरों को तीन दिनों के भीतर शत-प्रतिशत अद्यतन (अपडेट) और डिजिटलीकृत करने का आदेश दिया है।

पंचायतवार इसकी निगरानी ब्लॉक हेल्थ मैनेजर (BHM), ब्लॉक कम्युनिटी मैनेजर (BCM) और ब्लॉक मॉनिटरिंग इवैल्यूएटर (BME) को सौंपी गई है। साथ ही लंबे समय से निष्क्रिय पड़ी आशा कार्यकर्ताओं को चिन्हित कर सूची तैयार करने का निर्देश दिया गया है।

"प्रसव के शुरुआती 42 दिन मां और बच्चे दोनों के लिए बेहद नाजुक होते हैं। गृह भ्रमण से खतरे के लक्षणों की समय पर पहचान कर मासूमों को उचित उपचार तक पहुंचाना संभव होता है। तीन दिनों में आशा रजिस्टरों को डिजिटलाइज करने का निर्देश बीएचएम, बीसीएम व बीएमई को दिया गया है।"

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— सुमन सिंहा, डीडीए (स्वास्थ्य विभाग, किशनगंज)