किशनगंज की जैनब खातून ने 50 हजार के ऋण से बदली तकदीर, चाय-नाश्ते की दुकान से सालाना कमाई 2 लाख पार
किशनगंज की जैनब खातून ने जीविका स्वयं सहायता समूह से 50 हजार का ऋण लेकर चाय-नाश्ते और जनरल स्टोर का ...और पढ़ें

किशनगंज के बहादुरगंज में अपनी दुकान चलाती आत्मनिर्भर जीविका दीदी जैनब खातून।
HighLights
जीविका समूह से 50 हजार रुपये का ऋण लिया।
चाय-नाश्ते और जनरल स्टोर का व्यवसाय शुरू किया।
सालाना आय 2 लाख रुपये से अधिक हुई।
संवाद सहयोगी, किशनगंज। कभी परिवार की छोटी-मोटी जरूरतों को पूरा करने के लिए दूसरों के आगे हाथ फैलाने को मजबूर रहने वाली जैनब खातून आज अपनी कड़ी मेहनत, हुनर और मजबूत हौसले के दम पर जिले में आत्मनिर्भरता की एक नई नजीर पेश कर रही हैं।
बिहार सरकार की 'जीविका' (बिहार ग्रामीण जीविकोपार्जन प्रोत्साहन समिति) स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद उन्होंने स्वरोजगार को अपना हथियार बनाया और आज चाय-नाश्ते की दुकान के साथ-साथ जनरल स्टोर का सफल संचालन कर रही हैं। वर्तमान में उनकी सालाना आमदनी दो लाख रुपये से अधिक हो चुकी है।
किशनगंज जिले के बहादुरगंज प्रखंड अंतर्गत बनगामा पंचायत की रहने वाली जैनब खातून स्थानीय 'संध्या स्वयं सहायता समूह' और 'महक ग्राम संगठन' की सक्रिय सदस्य हैं। समूह की बैठकों में नियमित शामिल होने और अन्य जीविका दीदियों के अनुभवों से प्रेरणा लेकर उन्होंने खुद का व्यवसाय शुरू करने का संकल्प लिया था।
50 हजार का लोन और नेशनल हाईवे किनारे जमाया कारोबार
जैनब बताती हैं कि कुछ समय पहले तक उनके परिवार की माली हालत बिल्कुल ठीक नहीं थी। रोजाना की कमाई का कोई निश्चित साधन न होने के कारण घर खर्च चलाना भी मुश्किल हो जाता था।
इस बीच उन्होंने जीविका समूह के माध्यम से 50 हजार रुपये का आसान ऋण लिया। इस पूंजी से उन्होंने नेशनल हाईवे के समीप चाय-नाश्ते की एक छोटी दुकान और साथ में जनरल स्टोर खोला।
उनकी ईमानदारी, ग्राहकों के प्रति मधुर व्यवहार और हाईवे पर वाहनों की आवाजाही के कारण धीरे-धीरे उनका कारोबार रफ्तार पकड़ने लगा। आज इन दोनों व्यवसायों से उन्हें हर महीने 20 से 25 हजार रुपये तक की शुद्ध आमदनी हो रही है।
आर्थिक स्वावलंबन से बढ़ा समाज में मान-सम्मान
जैनब खातून का कहना है कि जीविका से जुड़ने के बाद उनके भीतर आत्मबल और आत्मविश्वास में जबरदस्त वृद्धि हुई। अब वे न केवल अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूती दे पा रही हैं, बल्कि अपने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई पर भी विशेष ध्यान दे रही हैं।
भविष्य के लिए बचत योजनाओं पर काम करने के साथ-साथ अब वे परिवार के महत्वपूर्ण फैसलों में खुद निर्णय ले पाती हैं। उनका मानना है कि आर्थिक स्वावलंबन ने उन्हें केवल आमदनी का जरिया ही नहीं दिया, बल्कि समाज में एक सम्मानित पहचान और अपने पैरों पर खड़े होने की ताकत भी दी है।
"पहले छोटी-छोटी जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता था। जीविका समूह से मिले 50 हजार रुपये के ऋण ने मेरी जिंदगी बदल दी। आज खुद की दुकान से हर महीने 20-25 हजार रुपये कमाकर परिवार को बेहतर जीवन दे पा रही हूँ।"
— जैनब खातून, जीविका दीदी, बनगामा (बहादुरगंज, किशनगंज)
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