किशनगंज। ईद मिलाद-उन-नबी हर साल दुनिया के आखरी पैगम्बर ह•ारत मुहम्मद सल्लललाहो अलैहि व सल्लम के जन्मदिन पर मनाई जाती है। इस मौके पर पोठिया प्रखंड क्षेत्र में अलग अलग गांव में सुन्नी वल जमाअत के मानने वाले लोग जलूस ए मुहम्मदी का आयोजन बड़े आन बान और शान के साथ करते हैं। इस्लामी कलैंडर के मुताबिक इस साल ईद मिलाद-उन-नबी का जुलूस आगामी 19 अक्टूबर मंगलवार को निकाली जाएगी। जिसकी तैयारी में मुस्लिम समुदाय के लोग जुट गए हैं।

बुढ़नई पंचायत के डांगी बस्ती गांव निवासी मौलाना सईदुर्रहमान मिस्बाही ने हजरत मुहम्मद सल्लललाहो अलैहि व वसल्लम की जीवनी पर रौशनी डालते हुए बताया कि ह•ारत मुहम्मद सल्लललाहो अलैहि व सल्लम का जन्म 6 अप्रैल 570 ई को अरब देश के मक्का शरीफ में हुआ था। जब ह•ारत मुहम्मद सल्लललाहो अलैहि व सल्लम का जन्म हुआ था। उस समय अरब देश की सामाजिक स्थिति काफी खराब थी। समाज में औरतों की कोई इज्जत नहीं थी। लोग अपने बेटियों को जिदा दफन कर देते थे।कबीले के लोग आपस में लड़ते झगड़ते रहते थे। जिससे हजारों लोगों को अपने •ादिगी से हाथ धोना पड़ता था। अरब के लोग शराब व जुए के आदी हो चुके थे। आपसी भाईचारा एवं प्यार मोहब्बत समाप्त हो चुका थ। इन सभी बुराईयों के विरुद्ध ह•ारत मुहम्मद सल्लललाहो अलैहि व सल्लम ने पहल की थी। जन्म के पहले ह•ारत मुहम्मद सल्लललाहो अलैहि व सल्लम के वालिद साहब की मौत हो चुका था। छह साल की उम्र में उनकी मां ह•ारत आमना भी दुनिया से चल बसी थी। उनका पालन पोषण उनके चाचा हजरत अबू तालिब ने किया था।

हजरत मुहम्मद सल्लललाहो अलैहि व सल्लम ने हमेशा लोगों की सेवा की। बचपन में उन्होंने अपने चाचा के लिए बकरियां भी चढ़ाई थी। क्योंकि चाचा अबू तालिब की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। बड़े होकर उन्होंने अरब की गिरते हुए समाज की दशा सुधारने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाया था। उन्होंने अपने से 15 वर्ष बड़ी विधवा औरत हजरत खदीजा से शादी की थी।उस समय यह बड़ी प्रगतिशिलता की बात थी। इससे समाज में एक अच्छा संदेश भी गया। कि विधवा औरत को भी समाज में पूरा इज्जत व सम्मान देना चाहिए। हजरत मुहम्मद सल्लललाहो अलैहि व सल्लम ने औरतों पर हो रहे जुल्म को रोका जिससे औरतों को समाज में इज्•ात की जिदगी मिली। दुनिया के आखरी पैगम्बर हजरत मुहम्मद सल्लललाहो अलैहि व सल्लम ने लोगों को हमेशा इंसानियत का पाठ पढ़ाया।

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