किशनगगंज [अमितेष] । मिथिलांचल के संदर्भ में पान, माछ और मखान की चर्चा करते लोग अघाते नहीं। सच तो यह है कि मिथिलांचल का हृदय कहे जाने वाले मधुबनी में ही सबसे पहले मखाना की खेती की शुरुआत हुई थी। बिहार गजेटियर में भी इसका जिक्र है। मखाना मधुबनी से निकलकर भारत से बाहर फैला। आज यह दूर-दूर के देशों तक पहुंच चुका है।

1800 से पहले शुरू हुई खेती

जानकारों का मानना है कि दरभंगा महाराज के शासनकाल में मखाना की खेती दरभंगा और मधुबनी जिले में बड़े पैमाने पर होती थी। अनुमानत: इसकी खेती सन् 1800 से पूर्व शुरू हुई। दरभंगा महाराज का कालखंड 800 ई से पूर्व ही है। डॉ पीसी राय चैधरी द्वारा संपादित व 1954 में प्रकाशित बिहार गजेटियर के 11वें संस्करण में इस बात का जिक्र किया है कि तब के दरभंगा जिले के मधुबनी सदर अनुमंडल में मखाना की खेती की शुरुआत हुई थी। उस समय किसानों को तीन रुपये प्रति एकड़ मुनाफा होता था। गजेटियर में अलबत्ता इसकी खेती के शुरुआती वर्ष का उल्लेख नहीं।

भारत से विदेशों में गया मखाना

बिहार कृषि विश्वविद्यालय (सबौर) के कुलपति डॉ. अजय कुमार बताते हैं कि मखाना की खेती की शुरुआत मधुबनी में होने का जिक्र गजेटियर में है। भारत से होते हुए यह पाकिस्तान, चीन, कनाडा, मलेशिया, बांग्लादेश समेत अन्य देशों तक पहुंच चुका है, लेकिन इसकी व्यावसायिक खेती भारत में ही हो रही है। इस लिहाज से बिहार के किसानों को अधिक से अधिक लाभांश दिलाने के मकसद से राष्ट्रीय कृषि विपणन संस्थान नियाम के साथ मिलकर मखाना की मार्केटिंग और ब्रांडिंग की जा रही है।

पोषक तत्वों की बदौलत बढ़ा दायरा

बरसात के मौसम में तालाबों में यूनिक प्रोडक्ट के तौर पर मधुबनी में न सिर्फ खेती हुई थी, बल्कि मखाना का नामकरण भी किया गया था। शुरुआती दौर में किसानों को तीन से चार रुपये प्रति एकड़ मुनाफा होता था। उसके बाद धीरे धीरे इसकी खेती आस-पड़ोस से होते हुए मिथिलांचल के अन्य हिस्सों में होने लगी। मखाना में अधिक मात्रा में पोषक तत्व पाए जाने के कारण मांग बढऩे लगी तो खेती भी बड़े पैमाने पर होने लगी।

Posted By: Amit Alok

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