कटिहार। पश्चिम बंगाल से सटे कटिहार जिले में होने वाली दुर्गा पूजा बिहारी-बंगाली संस्कृति के संगम की अनूठी मिसाल पेश करता है। यहां अधिकांश पूजा पंडालों से लेकर मां दुर्गा की प्रतिमा तक में भी बंगाली संस्कृति की झलक दिखती है। यहां दुर्गा पूजा के अवसर पर बनाया जाने वाला पंडाल पूरे सीमांचल के लिए आकर्षण का केन्द्र होता है। अमूमन पंडाल निर्माण में पांच से लेकर 15 लाख का खर्च आता है। यहां की पंडाल की विशेषता बंगाली संस्कृति का सम्मिश्रण है।

रेल क्षेत्र होने से बड़ी संख्या में रहते हैं बंगाली परिवार :

कटिहार शुरू से ही रेल क्षेत्र में धनी रहा है। बड़ी संख्या में रेलवे में नौकरी करने आये बंगाली परिवार के लोग यहीं बस चुके हैं। पश्चिम बंगाल के नजदीक होने के साथ ही व्यापार की असीम संभावना होने के कारण भी यहां अच्छी खासी बंगाली आबादी है। दुर्गा पूजा में इसका जीवंत प्रमाण दिखता है।

ढाक की थाप से गूंजता है पंडाल :

बंगाली परंपरा के अनुसार दुर्गा पूजा के अवसर पर वाद्य यंत्र ढाक बजाने की यहां पुरानी परंपरा है। बंगाली सभ्यता की धरोहर माने जाने वाले ढाक की थाप बरबस ही बंगाली संस्कृति की याद दिलाती है। जबकि बड़ी संख्या में महिलाओं द्वारा संध्या आरती और पूजा के आयोजन में शामिल होने के साथ बांग्ला पद्धति से पूजा अर्चना की जाती है।

हिन्दू व मुस्लिम भी मिलकर करते हैं पूजा :

यहां एक और खासियत है। शहर के सबसे बड़े पूजा पंडाल एलडब्ल्यूसी क्लब में हिन्दू व मुस्लिम समुदाय के लोग मिल जुलकर मां दुर्गा की पूजा अर्चना करते हैं। यहां दोनों समुदाय के लोगों द्वारा पूजा का आयोजन किया जाता है। वर्षों से यह परंपरा चली आ रही है। सामाजिक सौहार्द का यह अनूठा मिसाल है।