जहां हजारों साल पहले रहते थे आदिमानव, वहीं मिला 5वीं-6वीं सदी का शिलालेख; कैमूर की सीता की मड़ई का रोचक इतिहास
कैमूर की पहाड़ियों में स्थित सीता की मड़ई एक ऐतिहासिक स्थल है, जहाँ मध्य पाषाण काल के आदिमानव शैलचित्र और गुप्तकालीन ब्राह्मी शिलालेख मिले हैं।

कैमूर पहाड़ी पर उभरी आकृति। सौ-इतिहासकार
HighLights
सीता की मड़ई में मिले मध्य पाषाण कालीन शैलचित्र।
गुफा में गुप्तकालीन ब्राह्मी लिपि का शिलालेख मौजूद।
संरक्षण से कैमूर बन सकता है महत्वपूर्ण पर्यटन केंद्र।
जागरण संवाददाता, भभुआ। कैमूर की पहाड़ियां अपने भीतर इतिहास के कई प्रमाण समेटे हुए हैं। यहां कई ऐसे ऐतिहासिक स्थल और शैलचित्र मौजूद हैं, जिनका संबंध प्राचीन मानव सभ्यता से है।
यदि इनका संरक्षण और विकास किया जाए तो कैमूर में पर्यटकों का आकर्षण बढ़ सकता है और लोग इन प्राचीन स्थलों के इतिहास से परिचित हो सकेंगे।
ऐसा ही एक ऐतिहासिक स्थल रामपुर प्रखंड की खजुरा पहाड़ी पर स्थित है। इसे सीता की मड़ई के नाम से जाना जाता है। यह एक प्राकृतिक गुफा है, जहां हजारों वर्षों तक आदिमानव के निवास के प्रमाण मिलते हैं।
गुफा की छत और दीवारों पर बने शैलचित्र इसके प्रमाण हैं। यह एक चित्रित शैलाश्रय है, जहां आदिमानव ने अपने जीवन और आसपास के परिवेश से जुड़े कई चित्र उकेरे हैं।
पशु और मानव की हैं कई आकृतियां
इस गुफा की छत और दीवारों पर गाढ़े लाल रंग से बनाए गए शैलचित्र दिखाई देते हैं। छत के एक हिस्से में करीब एक वर्ग मीटर क्षेत्र में पशु और मानव आकृतियां बनी हैं।
इनमें एक सांड़ का चित्र प्रमुख है। सांड़ को आगे और पीछे से मानव आकृतियों ने घेर रखा है और वे हथियारों से उसे मारने का प्रयास करते दिखाई देते हैं।
यहां अन्य पशु आकृतियां भी हैं, जिनमें मानवों द्वारा शिकार किए जाने का दृश्य उकेरा गया है। दीवारों पर भी करीब एक वर्ग मीटर क्षेत्र में मानव और पशुओं की कई आकृतियां बनी हैं।
गाढ़े लाल रंग से बनाए गए चित्रों में बलशाली मानव आकृतियां दिखाई देती हैं, जो पशुओं को रोकने या उनका शिकार करने का प्रयास कर रही हैं।
इन शैलचित्रों में सांड़, भैंसा, हाथी और हिरण जैसे पशुओं की आकृतियां हैं। इसके अलावा पक्षियों का भी चित्रण किया गया है।
एक चित्र में दो पक्षी आमने-सामने बैठे दिखाई देते हैं और उनकी चोंच आपस में सटी हुई है। दोनों को दाना चुगते हुए चित्रित किया गया है। इन प्रमुख चित्रों के अलावा शैलाश्रय में कई छोटे-छोटे चित्र भी बने हुए हैं।
सीता की मड़ई में मिले प्राचीन शैलचित्र
रोहतास और कैमूर के इतिहासकार डाॅ. श्याम सुंदर तिवारी के अनुसार, यहां मिले प्राचीन शैलचित्र मध्य पाषाण काल के माने जाते हैं। इसी शैलाश्रय में ब्राह्मी लिपि में एक पंक्ति का शिलालेख भी है।
उनके अनुसार यह शिलालेख गुप्तकालीन है और पांचवीं-छठी सदी ईस्वी का माना जाता है। यह शिलालेख संस्कृत में है। इसमें लिखा है- ''कुल चंद्र गिरी संत्तापः।'' इसका हिंदी भावार्थ है- ''कुलचंद्र गिरी निश्चित रूप से तपनशील अर्थात तपस्वी थे।''
इससे संकेत मिलता है कि यह शैलाश्रय, जिसे सीता की मड़ई और कुछ स्थानीय लोग ओसारी के नाम से भी जानते हैं, पांचवीं-छठी सदी में एक संत की तपस्थली रहा होगा।
कैमूर की पहाड़ियां प्रारंभिक काल से ही साधु-संतों की तपोस्थली रही हैं। भारतीय वांग्मय में भी इसके उल्लेख मिलते हैं। सीता की मड़ई में मिला शिलालेख इस परंपरा से जुड़ा एक महत्वपूर्ण लिखित प्रमाण माना जाता है।
ऐतिहासिक महत्व के बावजूद इस शैलाश्रय और यहां मौजूद प्राचीन शैलचित्रों के संरक्षण की आवश्यकता बनी हुई है। संरक्षण और पर्यटन की दृष्टि से विकास होने पर यह स्थल कैमूर के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित हो सकता है।
