कैमूर [जेएनएन]। 18 सितंबर 2016 की वह सुबह बहुत मनहूस थी। पता चला कि सीधी लड़ाई में पीठ दिखा कर भागने वाले आतंकियों ने जम्मू-कश्मीर के उरी स्थित सेना के कैंप में हमला कर 18 जवानों को मार दिया। इसमें कैमूर जिले के नुआंव थाना क्षेत्र के बड्ढा गांव निवासी मेरा बेटा राकेश कुमार भी था। देखते ही देखते सैकड़ों लोग घर पर जुट गए। आतंकियों की इस कायराना हरकत से बच्चे-बच्चे का खून खौल रहा था। राकेश समेत सभी 18 सैनिकों की शहादत का बदला लेने की जो आवाज उठी वह दिल्ली तक गूंजीं। लोगों की देशभक्ति के उफान को देखते हुए सरकार और सेना ने भी कदम उठाए और सर्जिकल स्ट्राइक कर कई आतंकियों को ढेर कर वीर जवानों की शहादत का बदला लिया। आइए जानते हैं, शहीद राकेश की कहानी, मां की जुबानी...

बेटे की शहादत पर फख्र, लेकिन प्रशासनिक सहयोग से असंतुष्ट

बेटे की शहादत पर मुझे फख्र है। मैंने सेना में जाते समय जरा भी संकोच नहीं किया था। वर्ष 2008 में वह सेना में नियुक्त हुआ। अलग-अलग जगहों पर उसने देश की सेवा की। कई जगहों पर पहले  भी आतंकियों से न केवल लोहा लिया बल्कि मुंहतोड़ जवाब देकर उनके दांत भी खट्टे किए थे।

जब भी आता था अपनी और साथियों की कहानियां सुनाता था। लेकिन कायर आतंकियों ने 18 सितंबर की सुबह कैंप में घात लगाकर हमला कर दिया। सो रहे मेरे बेटे व अन्य जवानों ने आनन-फानन में मोर्चा संभाला और जवाबी कार्रवाई की। हालांकि, इसमें राकेश समेत 18 जवान शहीद हो गए।

शासन ने नहीं किया शहादत का सम्मान

राकेश के पिता ने सब्जी की दुकान चलाकर अपने चारो बच्चों को पढ़ाया लिखाया था। राकेश कुमार देश सेवा के लिए आगे बढ़ा और शहीद हो गया। वह घर का अकेला कमाऊ था। लेकिन, प्रशासन ने उसकी शहादत का सम्मान नहीं किया। शहीद होने के बाद सरकार ने केवल सहायता राशि दी लेकिन चार एकड़ जमीन, एक आश्रित को नौकरी, हमें  वृद्धा पेंशन आदि के वादे आजतक पूरे नहीं किए। आज भी सब्जी की दुकान ही हमारी रोजी-रोटी का सहारा है।

राज्यपाल ने भी दिया था सहयोग का आश्वासन

राकेश के शहीद होने के कुछ माह बाद जिला मुख्यालय भभुआ में हुए सम्मान कार्यक्रम में अब राष्ट्रपति और तत्कालीन राज्यपाल रामनाथ कोङ्क्षवद ने सहयोग का आश्वासन दिया। उन्होंने शहीद राकेश को श्रद्धांजलि देते हुए हमें कई आश्वासन दिए थे। फिर भी आज तक किसी प्रकार का कोई सहयोग नहीं मिला।

शहीद राकेश का स्मारक आज भी अधूरा

प्रशासन की उपेक्षा का आलम यह है कि स्मारक बनाया गया लेकिन आजतक उसका निर्माण कार्य पूरा नहीं हो सका है।  प्रतिमा लगाने के बाद उस पर छज्जा तक नहीं लगाया गया और न ही ठीक से मिट्टी भरी गई। गांव के लोगों ने स्मारक को बनवाने में सहयोग किया लेकिन प्रशासनिक स्तर से कोई सहयोग नहीं मिला।

(जैसा कि शहीद राकेश कुमार की मां समुंद्री देवी ने कैमूर जिले के नुआंव संवाददाता दीपक कुमार को बताया। )

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''आतंकियों को मुंहतोड़ जवाब देते हुए मेरा बेटा राकेश शहीद तो हो गया पर जिले के युवाओं के दिल में वह जो देशभक्ति की भावना जगा गया, वह अभी भी जल रही है। वह कभी समाप्त नहीं हो सकती। उसके अंतिम दर्शन का मानो पूरा जिला उमड़ पड़ा था, हर खास और आम आदमी वहां मौजूद था।''

- हरिहर सिंह (शहीद राकेश कुमार के पिता)

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