कैमूर। मोहनियां अनुमंडल अस्पताल परिसर में अवस्थित लोक नायक जय प्रकाश नारायण रक्त अधिकोष इतिहास के पन्नों में दफन हो गया। एक समय था जब 1990 के दशक में मोहनियां का ब्लड बैंक देश स्तर पर सुर्खियों में था। निर्माण काल के कुछ ही दिनों बाद महाराष्ट्र में आए भूकंप पीड़ितों को इस ब्लड बैंक से एक सौ बोतल खून भेजा गया था। 1996 में मुठानी के पास दिल्ली-हावड़ा राजधानी एक्सप्रेस के दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद काफी संख्या में घायलों को खून देकर उनकी जान बचाने का सेहरा भी इसी के माथे बंधा था। इसके अलावा कई उपलब्धियां इसके नाम के साथ जुड़ी। तब यह ब्लड बैंक अपनी उपलब्धियों पर इतरा रहा था। मोहनियां वासियों को भी इस पर गर्व था। तब किसी ने यह सोचा भी नहीं होगा कि इस ब्लड बैंक को यह दुर्दिन देखना पड़ेगा। एक समय ऐसा भी आएगा जब इसका नामोनिशान ही मिट जाएगा। 18 वर्षो से बंद पड़े लोक नारायण जय प्रकाश रक्त अधिकोष को उद्धारक की तलाश थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कहा जाता है समय सब को तोड़ देता है। वही इस ब्लड बैंक के साथ भी हुआ। कोरोना की तीसरी लहर को देखते हुए मोहनियां अनुमंडल अस्पताल परिसर में ऑक्सीजन प्लांट लगाने की योजना है। जिसके निर्माण की कवायद शुरू हो गई है। अनुमंडल अस्पताल में जगह की कमी के कारण जर्जर हो चुके रक्त अधिकोष को ध्वस्त कर यहीं ऑक्सीजन प्लांट बैठाने की योजना बनी। करीब 10 दिन पूर्व मोहनियां की एसडीएम अमृषा बैंस ने उपाधीक्षक डा. एके दास के साथ अस्पताल परिसर का निरीक्षण किया। जिसमें ब्लड बैंक के जर्जर को तोड़कर वहां ऑक्सीजन प्लांट बनाने का निर्णय लिया गया। इसके बाद निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो गई। भवन निर्माण विभाग ने जेसीबी से जर्जर हो चुके ब्लड बैंक के भवन को ध्वस्त कर दिया है। मलवे को हटाया जा रहा है। अब लोगों के जेहन में इस रक्त अधिकोष की सुनहरी यादें रह गई हैं। नई पीढ़ी को इसकी उपलब्धियां सुनने को मिलेंगी। 1992 में उक्त रक्त अधिकोष के निर्माण का बुना गया था ताना बाना

वर्ष 1992 में तत्कालीन जिलाधिकारी आरके श्रीवास्तव एवं तत्कालीन रेफरल अस्पताल मोहनिया के प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी व वर्तमान बिहार रेड क्रॉस सोसाइटी के अध्यक्ष डा. विनय बहादुर सिन्हा ने मोहनियां में रक्त अधिकोष के निर्माण का ताना-बाना बुना था। तब रेफरल अस्पताल में मोतियाबिद के ऑपरेशन के लिए शिविर लगा था। इसमें तीन सौ मोतियाबिद के मरीजों का सफल ऑपरेशन हुआ था। कार्यक्रम से गदगद जिलाधिकारी ने डॉ विनय बहादुर सिन्हा से ऐसी लाभकारी योजना तैयार करने को कहा जी आम लोगों के लिए कल्याणकारी सिद्ध हो। डॉ सिन्हा ने तुरंत एक रक्त अधिकोष बनाने का प्रस्ताव रखा। बताया कि जीटी रोड पर आए दिन दुर्घटनाएं हो रही हैं और खून के अभाव में घायल दम तोड़ देते हैं। गया और वाराणसी के बीच में जीटी रोड पर कोई भी ब्लड बैंक नहीं है। डीएम को बात जंची और आनन-फानन में मोहनियां के तत्कालीन बीडीओ को राजनीतिक कार्यकर्ताओं एवं स्वयंसेवी संस्थाओं के साथ बैठक कर प्रारूप तैयार करने को कहा गया। लोग तन मन धन से जुटे और एक वर्ष में रक्त अधिकोष बनकर तैयार हो गया।

1993 में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने इसका किया था उद्घाटन रक्त अधिकोष का भवन तैयार होने के बाद इसके अनुज्ञप्ति के लिए बिहार राज्य औषधि नियंत्रक के शर्तों के अनुसार एक चिकित्सा पदाधिकारी के साथ टेक्नीशियन और नर्सों को प्रशिक्षण लेना आवश्यक था। डॉ विनय बहादुर सिन्हा ने पटना व मुंबई के रक्त अधिकोष में सहायकों के साथ प्रशिक्षण प्राप्त किया। 11 जनवरी 1993 को तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद द्वारा लोकनायक जयप्रकाश नारायण रक्त अधिकोष का विधिवत उद्घाटन किया। मोहनियां जैसे छोटे जगह में साधन संपन्न रक्त कोष की स्थापना पर उन्होंने आश्चर्य व्यक्त करते हुए पदाधिकारियों एवं स्थानीय लोगों को बधाई दी थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री ने महाराष्ट्र के भूकंप पीड़ितों के लिए इस ब्लड बैंक से एक सौ बोतल खून भेजने की इच्छा जताई। दूरभाष पर इसकी सूचना मिलते ही जिलाधिकारी आरके श्रीवास्तव के साथ काफी संख्या में लोग रक्तदान करने के लिए रक्त कोष परिसर में जुट गए। रक्तदान करने वालों की भीड़ इतनी हुई की सौ बोतल खून लेने के बाद लोगों को रक्तदान करने से मना करना पड़ा था।वर्ष 1993 से 2000 तक के ऐतिहासिक सफर में इस ब्लड बैंक को काफी सोहरत मिली। इसकी खास बात यह रही कि मुगलसराय गया रेलखंड के बीच जीटी रोड पर यह इकलौता रक्त अधिकोष था।

कैसे बंद हुआ यह रक्त अधिकोष-

इसके नाम उपलब्धियों के जुड़ने का सिलसिला जारी था तभी तुषारापात हुआ। बिहार राज्य औषधि नियंत्रक ने 25 जून 2000 को रक्त अधिकोष के सचिव डॉ विनय बहादुर सिन्हा को पत्र भेजा।जिसमें कहा गया था कि रक्त अधिकोष का नवीकरण तभी संभव है जब इसमें चार अन्य एयर कंडीशनर, ब्लड बैंक फ्रिज, एलिजा मशीन एवं उपकरणों को बढ़ाया जाए। जब तक उपकरणों की व्यवस्था नहीं हो जाती तब तक जेपी नारायण रक्त अधिकोष के कार्य संपादन पर रोक लगाई जाती है। उपकरणों की व्यवस्था में करीब पांच लाख रुपए का खर्च था। जिसकी वजह से यह रक्त अधिकोष बंद हो गया। तभी से इसके चालू करने की बात हो रही थी। लेकिन अब इस रक्त अधिकोष का अस्तित्व ही मिट गया।

Edited By: Jagran