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कोबरा ने डंसा, अस्पताल से मिला निराशा का जवाब ; झाड़-फूंक के बीच बुझ गई जमुई के सात साल के सूरज की जिंदगी

Published: Sun, 07 Jun 2026 12:55 AM (IST)

सात वर्षीय सूरज कुमार की कोबरा के काटने से मौत हो गई, जिसके बाद परिजनों ने सोनो सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ...और पढ़ें

कोबरा ने डंसा, अस्पताल से लौटा दिया गया; सात वर्षीय सूरज की मौत से उठे सवाल

कोबरा ने डंसा, अस्पताल से लौटा दिया गया; सात वर्षीय सूरज की मौत से उठे सवाल

HighLights

  1. सात वर्षीय बालक की कोबरा के काटने से मौत।

  2. अस्पताल में डॉक्टर न होने से इलाज में देरी।

  3. ग्रामीणों में स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर गहरा आक्रोश।

संवाद सूत्र, सोनो (जमुई)। थाना क्षेत्र के पूर्वी मांझी टोला में शनिवार को हुई एक दर्दनाक घटना ने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया। गेहूंअन (कोबरा) सांप के डंसने से सात वर्षीय बालक सूरज कुमार की मौत हो गई। मृतक मिट्ठू मांझी का पुत्र था। इस घटना के बाद जहां परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है, वहीं ग्रामीणों में स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर भारी नाराजगी और आक्रोश देखा जा रहा है।

घर के बाहर बैठा था मासूम, तभी कोबरा ने डंसा

स्वजनों के अनुसार, शनिवार सुबह करीब पांच बजे सूरज नींद से जागने के बाद घर के बाहर बैठा हुआ था। इसी दौरान पास के एक बिल से निकला कोबरा सांप उसके पास पहुंचा और उसे डंस लिया। शुरुआत में परिजन घटना की गंभीरता को नहीं समझ पाए, लेकिन कुछ ही देर में बच्चे की तबीयत तेजी से बिगड़ने लगी।

मासूम की हालत खराब होते देख स्वजन घबरा गए और आनन-फानन में उसे लेकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, सोनो पहुंचे।

अस्पताल में चिकित्सक नहीं होने का आरोप

परिजनों का आरोप है कि अस्पताल पहुंचने पर उन्हें निराशा हाथ लगी। वहां मौजूद कर्मियों ने यह कहते हुए बच्चे को वापस भेज दिया कि अस्पताल में कोई चिकित्सक उपलब्ध नहीं है और उसे कहीं अन्यत्र ले जाना होगा।

स्वजन का कहना है कि यदि उसी समय बच्चे का इलाज शुरू हो जाता तो उसकी जान बचाई जा सकती थी। अस्पताल से लौटने के बाद परिजन काफी परेशान हो गए और गांव के लोगों की सलाह पर बच्चे को झाड़-फूंक के लिए विषहर स्थान ले गए।

अंधविश्वास और देरी ने छीन ली जिंदगी

इलाज में हुई देरी और झाड़-फूंक के भरोसे समय गंवाने का खामियाजा मासूम को अपनी जान देकर चुकाना पड़ा। परिजन बच्चे को बचाने की हरसंभव कोशिश करते रहे, लेकिन उसकी स्थिति लगातार बिगड़ती गई और आखिरकार उसकी मौत हो गई।

घटना के बाद पूरे गांव में शोक का माहौल है। मृतक की मां और पिता का रो-रोकर बुरा हाल है। ग्रामीण भी इस हादसे से स्तब्ध हैं।

स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल

सूरज की मौत के बाद स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। परिजनों का आरोप है कि अस्पताल में समय पर प्राथमिक उपचार और एंटी-वेनम इंजेक्शन उपलब्ध कराया जाता तो बच्चे की जान बच सकती थी।

ग्रामीणों के बीच भी यही चर्चा है कि मौत सिर्फ सर्पदंश से नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था की लापरवाही और समय पर इलाज नहीं मिलने के कारण हुई।

एंटी-स्नेक वेनम होने के बावजूद इलाज क्यों नहीं?

मामले ने तब और गंभीर रूप ले लिया जब प्रखंड स्वास्थ्य प्रबंधक ने स्वीकार किया कि अस्पताल में एंटी-स्नेक वेनम उपलब्ध था। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब जीवनरक्षक दवा मौजूद थी तो उसका उपयोग क्यों नहीं किया गया।

स्वजनों का यह भी आरोप है कि बच्चे को अस्पताल लाए जाने के बावजूद उसका नाम तक रजिस्टर में दर्ज नहीं किया गया। इससे अस्पताल प्रशासन की कार्यशैली पर भी प्रश्नचिह्न लग गया है।

दूसरी बार अस्पताल पहुंचने तक हो चुकी थी मौत

परिजनों के अनुसार, झाड़-फूंक से कोई फायदा नहीं मिलने पर वे बच्चे को दोबारा अस्पताल लेकर पहुंचे। इस बार डा. किरण कुमारी ने बच्चे की जांच की, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी और सूरज दम तोड़ चुका था।

जांच के आदेश, कार्रवाई की बात

प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी डा. शशिभूषण चौधरी ने मामले की जांच कराने और दोषियों पर कार्रवाई करने की बात कही है। हालांकि, गांव के लोगों का कहना है कि जांच और कार्रवाई से एक परिवार का उजड़ा हुआ संसार वापस नहीं लौट सकता।

ग्रामीणों में आक्रोश

मासूम की मौत के बाद ग्रामीणों में स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर गहरा आक्रोश है। लोगों का कहना है कि सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों की उपलब्धता और आपातकालीन सेवाओं को मजबूत किए बिना ऐसी घटनाओं पर रोक लगाना मुश्किल होगा।

सूरज की मौत ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाएं कब तक कागजों तक सीमित रहेंगी। कई ग्रामीणों का कहना है कि कभी-कभी जानलेवा जहर सिर्फ सांप के दांतों में नहीं, बल्कि व्यवस्था की उदासीनता में भी छिपा होता है।on