बिहार में करमा पर्व की धूम! 'अपना करम, भाई का धरम' गीत और मांदर की थाप से गूंजे टाले, बहनों ने रखा निर्जला व्रत
जमुई के सिमुलतला और चकाई में प्रकृति और पारिवारिक आत्मीयता का लोकपर्व करमा उत्साह के साथ मनाया गया।

बिहार में करमा पर्व की गूंज। फोटो जागरण
HighLights
जमुई में करमा पर्व श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया।
बहनें भाइयों की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए व्रत रखती हैं।
पारंपरिक गीतों, ढोल-मांदर की थाप पर रात भर पूजा-अर्चना हुई।
संवाद सूत्र, सिमुलतला (जमुई)। प्रकृति और पारिवारिक आत्मीयता का पर्व करमा मंगलवार को सिमुलतला थाना क्षेत्र में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है।
पारंपरिक करमा गीतों से सिमुलतला, टेलवा और लोहिया चौक के हाट-बाजार गूंज रहे हैं। रंग-बिरंगे परिधानों में सज-धजकर लोकगीत गाते हुए फूल चुनने निकली युवतियों और महिलाओं की टोलियों से पूरा इलाका उत्सवी रंग में रंग गया है।
भादो मास की एकादशी को मुख्य रूप से मनाए जाने वाले इस लोकपर्व में भाई और पिता की लंबी आयु, सुख-समृद्धि व सुरक्षा की कामना की जाती है। पर्व की रस्म के तहत भाई करम वृक्ष की डाल काटकर बहनों को सौंपते हैं। इसके बाद घर के आंगन में गड्ढा खोदकर करम डाल की स्थापना की जाती है।
बहनें इसे ताजे फूलों, पत्तियों और फलों से सजाती हैं। शाम ढलते ही आंगन में घी के दीपक जलाए जाते हैं। मान्यता है कि बहन के निर्जला उपवास की शुद्धता पर दीपक की अखंड लौ निर्भर करती है। स्थापित करम डाल की परिक्रमा करते हुए बहनें रात भर पारंपरिक गीतों के साथ मंगलकामना करती हैं।
अनुष्ठान के दौरान भाई बहनों की पीठ पर खीरा या मकई की बाली हल्के से थपथपाते हुए पूछते हैं, ‘किसका करम?’ बहनें स्नेहपूर्वक जवाब देती हैं, ‘अपना करम, भाई का धरम।’ इधर, रात भर रतजगा कर कथा-गीत और सामूहिक नृत्य के बाद अगले दिन करम डाल के विसर्जन के साथ पर्व संपन्न होगा।
चकाई के ग्रामीण इलाकों में करमा पर्व को लेकर उत्साह
चकाई प्रखंड क्षेत्र में भाई-बहन के अटूट प्रेम और प्रकृति पूजा का लोकपर्व करमा मंगलवार को भादो शुक्ल पक्ष एकादशी पर धूमधाम से मनाया जा रहा है। पर्व को लेकर लोगों में खासा उत्साह देखा जा रहा है। ढोल-मांदर की थाप और करमा गीतों से पूरा इलाका गूंजता रहा। मंगलवार अहले सुबह से व्रती बच्चियों और महिलाओं ने फूल लोढ़ा।
इसके बाद अखंड उपवास रखकर करमा वृक्ष की डाली, यानी करमा डार को आंगन या सार्वजनिक स्थल पर विधि-विधान से स्थापित किया। शाम होते ही व्रतियों ने कतारबद्ध होकर करमा डार की परिक्रमा करते हुए रात भर ढोल, मांदर और झाल की थाप पर पारंपरिक करमा गीत गाए और लोकनृत्य किया।
बुधवार की सुबह करमा डार और फूलों का नदी-तालाब में विसर्जन कर पूजा का समापन किया जाएगा। इसके बाद व्रती पारण करेंगी। आदिवासी समाज में इस पर्व की विशेष रौनक देखने को मिलती है। हर टोले में अलग-अलग दिन महिला-पुरुष सामूहिक रूप से पर्व मनाते हैं।
करमा पर्व को लेकर खैरा बाजार में बढ़ी चहल-पहल
करमा पर्व को लेकर खैरा बाजार में चहल-पहल बढ़ गई। पर्व की तैयारी को लेकर फलों और पूजन सामग्री की खरीदारी के लिए सुबह से ही लोगों की भीड़ जुटी रही। खासकर महिलाओं ने पूजा में इस्तेमाल होने वाले फल, मिठाई, धूप-दीप और अन्य पूजन सामग्री की खरीदारी की।
बाजार में विभिन्न प्रकार के फलों की दुकानें सजी रहीं। केला, सेब, नारियल, अमरूद, खीरा सहित अन्य फलों की बिक्री होती रही। ग्रामीण क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में लोग खरीदारी के लिए खैरा बाजार पहुंचे। भीड़ के कारण दिन भर बाजार में चहल-पहल बनी रही।
फल विक्रेताओं ने बताया कि पर्व को लेकर सामान्य दिनों की अपेक्षा फलों की मांग बढ़ी है। खरीदारों की भीड़ को देखते हुए दुकानदारों ने पर्याप्त मात्रा में फल मंगाए हैं।
वहीं, पूजन सामग्री की दुकानों पर भी महिलाओं की भीड़ देखी गई। करमा पर्व को लेकर लोगों में उत्साह है। घरों में साफ-सफाई के साथ पूजा की सामग्री जुटाने का काम किया जा रहा है। बाजार में खरीदारी बढ़ने से छोटे-बड़े दुकानदारों के चेहरे पर भी रौनक देखने को मिली।
