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5 साल की उम्र में पोलियो ने छीनी थी पैर की ताकत, हौसले से बने ‘गोल्डन ब्वॉय’; जापान में ब‍िहार के शैलेश ने रचा इतिहास

Published: Thu, 22 Oct 2026 10:59 PM (IST)

Jamui Shailesh Kumar Inspiring Story: जमुई के शैलेश कुमार ने जापान के नागोया में पैरा एशियाई खेलों में ऊंची कूद ...और पढ़ें

Jamui Shailesh Kumar Inspiring Story: जमुई के CDPO शैलेश ने जापान में जीता गोल्ड

Jamui Shailesh Kumar Inspiring Story: जमुई के CDPO शैलेश ने जापान में जीता गोल्ड

HighLights

  1. नागोया में पैरा एशियाई खेलों में ऊंची कूद में स्वर्ण पदक।

  2. बचपन में पोलियो से प्रभावित, दृढ़ संकल्प से हासिल की जीत।

  3. बिहार सरकार में सीडीपीओ, खेल के साथ जनसेवा भी।

जागरण संवाददाता, जमुई। Jamui Shailesh Kumar Inspiring Story: जापान के नागोया में जब तिरंगा सबसे ऊंचाई पर फहराया गया और स्टेडियम में राष्ट्रगान की धुन गूंजी, तो उसकी प्रतिध्वनि सात समंदर पार बिहार के जमुई जिले अंतर्गत अलीगंज प्रखंड के एक छोटे से गांव इस्लामनगर में आंसुओं, तालियों और नारों के रूप में गूंज उठी।

यह दास्तान महज किसी खिलाड़ी के पदक जीतने की नहीं है, बल्कि उस फौलादी जिजीविषा की है जिसने नियति के क्रूर फैसले को अपने कदमों तले रौंद दिया। बचपन में जिस पैर को पोलियो ने बेजान कर दिया था, उसी पैर के सहारे शैलेश कुमार ने पैरा एशियाई खेलों की ऊंची कूद (हाई जंप T63) स्पर्धा में 1.89 मीटर की रिकॉर्डतोड़ स्वर्णिम छलांग लगाकर साबित कर दिया कि हौसले अगर बुलंद हों, तो शारीरिक सीमाएं हमेशा बौनी साबित होती हैं।

सामान्य बच्चों संग दौड़ते-गिरते तराशा पैरा-एथलीट

शैलेश का सफर किसी प्रेरणादायी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। महज पांच वर्ष की अबोध उम्र में वे पोलियो के गंभीर हमले का शिकार हो गए, जिससे उनका दायां पैर हमेशा के लिए बेदम हो गया। ग्रामीण समाज में जहां ऐसी परिस्थितियों में लोग किस्मत को दोष देकर लाचारी स्वीकार कर लेते हैं, वहां शैलेश ने खुद को कभी दया का पात्र नहीं बनने दिया।

Bihar Shailesh Kumar Polio Survivor Wins Gold at Para Asian Games (1)

वे गांव की पगडंडियों और धूल भरे मैदानों में सामान्य बच्चों के साथ ही दौड़ते, गिरते, फिर संभलते और ऊंची छलांग लगाते। बार-बार गिरने के बाद भी उठ खड़े होने की इसी जिद ने उनके भीतर के एथलीट को तराश दिया। गांव के मैदान से शुरू हुआ यह सफर पहले जिला, फिर राज्य और अब विश्व पटल पर सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो चुका है।

गणित के समीकरण सुलझाए, बने सरकार में सीडीपीओ

शैलेश की शख्सियत सिर्फ खेल के मैदान तक ही सीमित नहीं है। उन्होंने साबित किया कि मेधा किसी एक दायरे में कैद नहीं रहती। खेल के कठोर और पसीना बहाने वाले अभ्यास के बीच भी उन्होंने कभी किताबों से मुंह नहीं मोड़ा।

गणित जैसे जटिल विषय में स्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद उन्होंने अपनी प्रशासनिक क्षमता का लोहा मनवाया। वर्तमान में वे बिहार सरकार के समाज कल्याण विभाग में बाल विकास परियोजना अधिकारी (सीडीपीओ) के पद पर निष्ठापूर्वक अपनी सेवाएं दे रहे हैं। मैदान में देश के लिए मेडल जीतना और दफ्तर में जनसेवा करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है।

Bihar Shailesh Kumar Polio Survivor Wins Gold at Para Asian Games (2)

पेरिस का मलाल नागोया की धरती पर धोया

वर्ष 2024 के पेरिस पैरा ओलिंपिक में शैलेश बेहद कड़े मुकाबले में महज कुछ सेंटीमीटर के अंतर से पदक से चूक गए थे और चौथे स्थान पर रहे थे। पोडियम से एक कदम दूर रह जाने की कसक उनके सीने में लगातार जल रही थी।

इस टीस को उन्होंने अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया। वर्ष 2025 में नई दिल्ली में आयोजित विश्व पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में 1.91 मीटर के नए एशियाई रिकॉर्ड के साथ उन्होंने वापसी की पटकथा लिखी। इसके बाद अब नागोया में हाई जंप में गेम्स रिकॉर्ड के साथ गोल्ड और लंबी कूद में कांस्य पदक जीतकर उन्होंने पेरिस के उस दर्द को हमेशा-हमेशा के लिए धो डाला।

'सिर्फ इस्लामनगर नहीं, पूरे देश का बेटा है शैलेश'

नागोया में शैलेश की दोहरी ऐतिहासिक जीत की खबर मिलते ही माता प्रतिमा देवी, पिता शिवनंदन यादव और बिहार पुलिस में कार्यरत बड़े भाई कौशल की आंखें खुशी से भर आईं। घर पर बधाई देने वालों का तांता लग गया।

इस्लामनगर के सरपंच राजेश मालाकार ने भावुक होते हुए कहा कि शैलेश ने जिस घोर आर्थिक तंगी और अभाव में यह मुकाम पाया है, उसे सोचकर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। आज वह सिर्फ इस्लामनगर का नहीं, बल्कि समूचे हिंदुस्तान का गौरव है।

जिले के डीएम नवीन, अंतरराष्ट्रीय एथलीट आशुतोष कुमार सिंह और डॉ. एसएन झा सहित कई गणमान्य लोगों ने शैलेश को बधाई दी। ग्रामीणों ने संकल्प लिया है कि जब गांव का यह लाल वतन लौटेगा, तो उसका स्वागत किसी राष्ट्रीय नायक की तरह भव्य जुलूस निकालकर किया जाएगा।

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