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कागजी आंकड़ों में उलझी खेती! जमुई में 90% धान रोपनी का दावा, सरकार ने सुखाड़ मानकर मनरेगा काम को दी हरी झंडी

Published: Wed, 21 Oct 2026 10:24 AM (IST)

Bihar MNREGA News: कृषि विभाग जमुई में 90% धान की रोपनी का दावा कर रहा है, जबकि ग्रामीण विकास विभाग ...और पढ़ें

Bihar MNREGA News: जमुई में कृषि विभाग और ग्रामीण विकास विभाग के आंकड़ों में भारी विरोधाभास

Bihar MNREGA News: जमुई में कृषि विभाग और ग्रामीण विकास विभाग के आंकड़ों में भारी विरोधाभास

HighLights

  1. कृषि विभाग ने जमुई में 90% धान रोपनी का दावा किया।

  2. ग्रामीण विकास ने जमुई को सूखाग्रस्त मानकर मनरेगा कार्य जारी रखा।

  3. इस विरोधाभास से कटाई में मजदूर संकट की आशंका।

संवाद सहयोगी, जमुई। Bihar MNREGA News: कृषि विभाग की रिपोर्ट हकीकत से कोसों दूर है या फिर ग्रामीण विकास विभाग का जमीनी आकलन गलत है—इसका सटीक फैसला तो उच्चस्तरीय जांच के बाद ही हो सकेगा। लेकिन दोनों विभागों की हालिया रिपोर्ट और आदेशों ने नीतिगत स्तर पर एक बड़ा विरोधाभास जरूर खड़ा कर दिया है।

एक तरफ कृषि विभाग के आधिकारिक आंकड़े दावा कर रहे हैं कि जमुई जिले में धान की रोपनी करीब 90 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है, वहीं दूसरी तरफ ग्रामीण विकास विभाग जिले को कम वर्षापात और सुखाड़ जैसी विषम स्थिति वाला मानते हुए कृषि कार्य की अधिसूचित अवधि में भी मनरेगा (बीवी जीरामजी) के तहत काम जारी रखने की विशेष छूट दे रहा है। आंकड़ों का यह टकराव केवल जमुई तक सीमित नहीं है, बल्कि बिहार के कई जिलों में ऐसी ही असमंजस भरी स्थिति बनी हुई है।

अगस्त-सितंबर की बारिश के बाद 90% रोपनी का विभागीय दावा

कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, अगस्त के अंतिम सप्ताह और सितंबर के पहले पखवाड़े में हुई मानसूनी बारिश ने जिले में धान आच्छादन को संजीवनी दी। विभागीय रिकॉर्ड के अनुसार, यदि केवल अलीगंज प्रखंड (लगभग 40 प्रतिशत रोपनी) को छोड़ दिया जाए, तो जिले के अधिकांश प्रखंडों में 97 से 100 प्रतिशत तक धान रोपनी का लक्ष्य हासिल कर लिया गया।

अलीगंज के कम प्रतिशत के कारण ही जिले का कुल औसत करीब 90 प्रतिशत पर रुका। पड़ोसी लखीसराय जिले में तो लक्ष्य से अधिक रोपनी दर्ज की गई है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब खेतों में धान की फसल लहलहा रही है, तो ग्रामीण विकास विभाग ने किस आधार पर इसे सुखाड़ की श्रेणी में डाल दिया?

22 अक्टूबर से 10 दिसंबर तक मनरेगा पर नहीं लगेगा ब्रेक

दरअसल, ग्रामीण विकास विभाग ने 17 अक्टूबर को एक अधिसूचना जारी कर 22 अक्टूबर से 10 दिसंबर 2026 तक की अवधि को कृषि कार्यों के लिए अधिसूचित किया है। 'विकसित भारत-रोजगार एवं आजीविका के लिए गारंटी मिशन (ग्रामीण) अधिनियम' के तहत तय नियमों के अनुसार, इस अवधि में मनरेगा का कोई नया काम शुरू नहीं किया जाता और न ही पुराने कार्य संचालित होते हैं। इसके पीछे मूल उद्देश्य खरीफ फसल की कटाई और रबी की बुआई के समय किसानों को पर्याप्त संख्या में कृषि मजदूर उपलब्ध कराना होता है।

हालांकि, नई अधिसूचना में राज्य के 22 जिलों को भीषण बाढ़ प्रभावित और जमुई सहित 16 जिलों को कम वर्षापात व सुखाड़ ग्रस्त मानकर इस कार्य-विराम से पूरी तरह मुक्त कर दिया गया है। विभाग का तर्क है कि सुखाड़ और कम नमी के चलते कृषि गतिविधियां सीमित रहेंगी, जिससे भूमिहीन मजदूरों के सामने रोजी-रोटी और पलायन का संकट न बने।

कटाई के मौसम में मजदूरों की किल्लत की आशंका

इस फैसले के सामने आने के बाद किसान हलकों में चिंता की लहर है। जमुई और लखीसराय जैसे कृषि प्रधान जिलों में धान की कटाई के समय स्थानीय मजदूरों के साथ-साथ उत्तर बिहार के विभिन्न जिलों से भी भारी संख्या में कृषि श्रमिक पहुंचते हैं।

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि जब खेतों में कटाई का पीक सीजन होगा, उस समय यदि मनरेगा के तहत मिट्टी भराई व अन्य निर्माण कार्य चालू रहेंगे, तो किसान मजदूरों के लिए तरस जाएंगे। इससे कटाई में देरी और रबी बुआई पिछड़ने का खतरा पैदा हो सकता है।

आंकड़ों के अंतर पर उठ रहे गंभीर सवाल

आरटीआई कार्यकर्ता गिरीश सिंह का कहना है कि एक ही राज्य सरकार के दो प्रमुख विभागों के आंकड़ों में इतना भारी अंतर चिंताजनक है। सवाल यह है कि ग्रामीण विकास विभाग ने सुखाड़ की श्रेणी तय करने के लिए वर्षापात के आंकड़े देखे, फसल की सेटेलाइट मॉनिटरिंग की या केवल औपचारिक रिपोर्ट के आधार पर आदेश जारी कर दिया?

किसानों और जानकारों की मांग है कि दोनों विभागों की रिपोर्ट का तुलनात्मक परीक्षण कर वस्तुस्थिति सार्वजनिक की जाए, ताकि सरकारी योजनाओं का लाभ सही मायनों में जरूरतमंदों तक पहुंचे और कृषि चक्र भी प्रभावित न हो।

जिलों का आधिकारिक वर्गीकरण

  • कम वर्षापात/सुखाड़ संभावित 16 जिले: जमुई, अररिया, औरंगाबाद, बांका, गया, जहानाबाद, कैमूर, किशनगंज, मधुबनी, नालंदा, नवादा, रोहतास, शेखपुरा, शिवहर, सीतामढ़ी और सीवान।

  • बाढ़ प्रभावित 22 जिले: अरवल, बेगूसराय, भागलपुर, भोजपुर, बक्सर, दरभंगा, गोपालगंज, कटिहार, खगड़िया, लखीसराय, मधेपुरा, मुंगेर, मुजफ्फरपुर, पश्चिम चंपारण, पटना, पूर्वी चंपारण, पूर्णिया, सहरसा, समस्तीपुर, सारण, सुपौल और वैशाली।