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न मिला शव वाहन न लकड़ी के पैसे, ठेले पर पत्नी का शव ले जाकर बुजुर्ग ने दफनाया, ब‍िहार में मानवता हुई शर्मसार

Published: Wed, 14 Oct 2026 08:21 AM (IST)

Jamui Dead Body on Cart: जमुई के झाझा में एक बुजुर्ग को एंबुलेंस, शव वाहन और दाह संस्कार के लिए ...और पढ़ें

Jamui Dead Body on Cart: जमुई के झाझा में सिस्टम की संवेदनहीनता के बाद ठेले पर अपनी पत्नी का शव ले जाता बेसहारा बुजुर्ग

 Jamui Dead Body on Cart: जमुई के झाझा में सिस्टम की संवेदनहीनता के बाद ठेले पर अपनी पत्नी का शव ले जाता बेसहारा बुजुर्ग

HighLights

  1. बुजुर्ग ने ठेले पर पत्नी का शव ले जाकर दफनाया।

  2. एंबुलेंस, शव वाहन और लकड़ी के पैसे नहीं मिले।

  3. सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत और संवेदनहीनता उजागर हुई।

संवाद सूत्र, बोड़वा/झाझा (जमुई)। Jamui Dead Body on Cart: बिहार के जमुई जिले अंतर्गत झाझा से स्वास्थ्य सेवाओं और जनकल्याणकारी योजनाओं के दावों की जमीनी हकीकत बयां करती एक रूह कंपा देने वाली तस्वीर सामने आई है। झाझा रेलवे कॉलोनी स्थित क्वार्टर में रहने वाले बेसहारा और निसंतान बुजुर्ग शिव कुमार दास की पत्नी राखी देवी (60) का घर पर ही निधन हो गया।

जीवन के अंतिम पड़ाव में जब बुजुर्ग को अपनी जीवनसंगिनी के अंतिम संस्कार की व्यवस्था करनी थी, तब सरकारी तंत्र की संवेदनहीनता ने उनकी लाचारी को कई गुना बढ़ा दिया। न तो स्वास्थ्य विभाग से एंबुलेंस मिली और न ही नगर प्रशासन से कोई शव वाहन मयस्सर हुआ।

युवाओं ने दिया ठेला, जीवनसंगिनी के शव को खुद खींचा

सरकारी तंत्र से जब कोई उम्मीद नहीं बची, तब स्थानीय मोहल्ले के कुछ युवाओं ने आगे आकर इंसानियत की मिसाल पेश की। युवाओं ने एक हाथ ठेले का बंदोबस्त किया। जिस उम्र में खुद सहारे और अपनों की देखरेख की जरूरत थी, उस ढलती उम्र में बेबस पति अपनी मृत पत्नी के शव को ठेले पर लादकर अंतिम विदाई देने निकल पड़ा। सड़क पर जिसने भी एक लाचार बुजुर्ग को अपनी पत्नी का शव ठेले पर ले जाते देखा, उसका कलेजा कांप उठा।

लकड़ी के पैसे नहीं थे, विवश होकर गड्ढे में दफनाया शव

गरीबी और अभाव का आलम यह था कि हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार दाह संस्कार करने के लिए बुजुर्ग के पास लकड़ी खरीदने तक के पैसे नहीं थे। शिव कुमार दास ने रुंधे गले और नम आंखों से अपनी व्यथा सुनाते हुए बताया कि उनके पास अंतिम संस्कार के लिए कोई साधन नहीं बचा था।

मजबूरी में गड्ढा खुदवाकर शव को मिट्टी में दफनाना पड़ा। उन्होंने बताया कि एक स्थानीय वार्ड सदस्य ने निजी तौर पर दो हजार रुपये देकर मदद की, लेकिन इसके अलावा न तो नगर परिषद की ओर से कोई सहायता मिली और न ही स्वास्थ्य विभाग का कोई नुमाइंदा सुध लेने पहुंचा।

अधिकारी बोले- मामला समझकर ही कुछ कह पाएंगे

सरकारी स्तर पर गरीब और असहाय परिवारों के लिए कबीर अंत्येष्टि अनुदान और शव वाहन जैसी कई योजनाएं कागजों पर संचालित हैं, लेकिन धरातल पर इस बेसहारा बुजुर्ग को कोई सहारा नहीं मिला।

इस घोर लापरवाही और प्रशासनिक बेरुखी को लेकर जब झाझा नगर परिषद के कार्यपालक पदाधिकारी जनार्दन वर्मा से उनका पक्ष लिया गया, तो उन्होंने मामले की जानकारी होने से ही साफ इनकार कर दिया। कार्यपालक पदाधिकारी ने कहा कि उन्हें इस घटना के संबंध में कोई सूचना नहीं है, पूरे मामले को समझने के बाद ही वे इस पर कुछ कह पाएंगे।