आयुर्वेद के 'गुरुजी' ने दुनिया को कहा अलविदा, प्रख्यात विद्वान प्रो. डॉ. सिद्धिनंदन मिश्र का निधन
आयुर्वेद के प्रख्यात विद्वान और राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित प्रोफेसर वैद्य डॉ. सिद्धिनंदन मिश्र का 94 वर्ष की आयु में जहानाबाद में निधन हो गया।

दिसंबर 2017 में तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने डॉ. सिद्धिनंदन को सम्मानित किया था।
HighLights
प्रख्यात आयुर्वेदाचार्य डॉ. सिद्धिनंदन मिश्र का 94 वर्ष की आयु में निधन।
रसशास्त्र के सिद्धहस्त विशेषज्ञ, 30 से अधिक पुस्तकों के लेखक थे।
राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित, 'गुरुजी' के नाम से जाने जाते थे।
जागरण संवाददाता, जहानाबाद। आयुर्वेद जगत के प्रख्यात विद्वान, रसशास्त्र के सिद्धहस्त विशेषज्ञ और राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित प्रोफेसर वैद्य डॉ. सिद्धिनंदन मिश्र का गुरुवार की शाम 94 वर्ष की अवस्था में निधन हो गया।
उन्होंने हुलासगंज प्रखंड के कंदौल गांव स्थित अपने पैतृक आवास पर अंतिम सांस ली। उनका पार्थिव शरीर कंदौल स्थित पैतृक आवास पर रखा है।
उनकी दोनों पुत्रियों एवं स्वजन के आने का इंतजार किया जा रहा था। ग्रामीणों के अनुसार, उनकी अंत्येष्टि वाराणसी के श्मशान घाट पर किए जाने की तैयारी है।

आयुर्वेद और रसशास्त्र के क्षेत्र में अद्वितीय पहचान
प्रो. डॉ. सिद्धिनंदन मिश्र आयुर्वेद के उन विरल विद्वानों में शामिल थे, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति के अध्ययन, अध्यापन, शोध और लेखन के लिए समर्पित कर दिया।
विशेष रूप से आयुर्वेद के रसशास्त्र विषय पर उनकी गहरी पकड़ थी। ग्रामीणों ने बताया कि पारद विज्ञान, औषधि निर्माण और प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथों के अध्ययन में उनकी विशेषज्ञता उन्हें विशिष्ट पहचान प्रदान करती थी।
डॉ. औषधीय उपयोग से जुड़ी इन प्रक्रियाओं के ज्ञान को वे अत्यंत गोपनीय और जिम्मेदारी का विषय मानते थे। डॉ. सिद्धिनंदन मिश्र ने वर्ष 1954 में पटना आयुर्वेदिक कॉलेज से बीएएमएस की उपाधि प्राप्त की थी।
इसके बाद वर्ष 1956 में इसी संस्थान में वैद्य के पद पर उनकी नियुक्ति हुई। यहीं से उनके लंबे शैक्षणिक और व्यावसायिक जीवन की महत्वपूर्ण शुरुआत हुई।
अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने गुजरात आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी सहित देश के विभिन्न प्रतिष्ठित आयुर्वेदिक एवं शैक्षणिक संस्थानों में योगदान दिया।
संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में उन्होंने आयुर्वेद विभागाध्यक्ष के रूप में भी अपनी सेवाएं दीं। उनका शैक्षणिक जीवन केवल कक्षाओं तक सीमित नहीं रहा।
वे प्राचीन आयुर्वेदिक ज्ञान को आधुनिक पीढ़ी तक पहुंचाने, पारंपरिक औषधि निर्माण की विधियों का अध्ययन करने तथा रसशास्त्र के गूढ़ विषयों को सरलता से समझाने के लिए भी जाने जाते थे।
30 से अधिक पुस्तकों की रचना, संस्कृत ग्रंथों का हिंदी में अनुवाद
डॉ. मिश्र की विद्वत्ता का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष उनका साहित्यिक एवं शोधपरक योगदान था। उन्होंने आयुर्वेद और रसशास्त्र से संबंधित 30 से अधिक पुस्तकों की रचना की।
इसके अतिरिक्त, प्राचीन संस्कृत आयुर्वेदिक ग्रंथों का हिंदी में अनुवाद और व्याख्या करके उन्होंने इस क्षेत्र के ज्ञान को अधिकाधिक विद्यार्थियों और पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास किया।
उनकी प्रमुख पुस्तकों में आयुर्वेदीय रसशास्त्र, प्रारंभिक रसशास्त्र, रसेंद्रचिंतामणि तथा आनंदकंद जैसी कृतियों का उल्लेख किया जाता है।
इन पुस्तकों में रसशास्त्र के सिद्धांतों, पारंपरिक औषधि निर्माण की प्रक्रियाओं और प्राचीन आयुर्वेदिक ज्ञान का विस्तृत विवेचन मिलता है।
उनकी रचनाएं आयुर्वेद के विद्यार्थियों, शिक्षकों और शोधार्थियों के लिए उपयोगी मानी जाती रही हैं। संस्कृत के प्राचीन ग्रंथों को हिंदी में समझाने के उनके प्रयास ने पारंपरिक ज्ञान के अध्ययन को सुगम बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने किया था सम्मानित
आयुर्वेद के क्षेत्र में उनके विशिष्ट योगदान के लिए दिसंबर 2017 में तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उन्हें सम्मानित किया था।
इस सम्मान ने राष्ट्रीय स्तर पर उनके लंबे शोधपरक और शैक्षणिक योगदान को पहचान दिलाई। उन्हें वैद्य रामनारायण शर्मा स्मृति पुरस्कार से भी सम्मानित किए जाने की जानकारी है।
इस सम्मान के अंतर्गत प्रशस्ति-पत्र, शॉल, दो लाख रुपये की पुरस्कार राशि और चांदी से निर्मित भगवान धन्वंतरि की प्रतिमा प्रदान की गई थी।
'गुरुजी' के नाम से थी पहचान
पटना आयुर्वेदिक कॉलेज के पूर्व छात्र रहे डॉ. मिश्र को आयुर्वेदिक जगत में सम्मानपूर्वक 'गुरुजी' के नाम से जाना जाता था। उनकी पहचान एक विद्वान शिक्षक, गंभीर अध्येता और परंपरागत आयुर्वेदिक ज्ञान के साधक के रूप में रही।
वे धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे और भगवान शिव के अनन्य भक्त माने जाते थे। अपने अध्ययन, अध्यापन और शोध के साथ उनका जीवन सादगी तथा आध्यात्मिकता से जुड़ा रहा। जीवन के अंतिम वर्षों में वे अपने पैतृक गांव कंदौल में रह रहे थे।
बताया जाता है कि अधिक उम्र होने के बावजूद वे लंबे समय तक वहां अकेले ही जीवट के साथ रहे। उनका जीवन ज्ञान, साधना और अपने कार्य के प्रति समर्पण का उदाहरण रहा।
उनकी दो पुत्रियां हैं। उनके जीवन को आयुर्वेद के अध्ययन, अध्यापन, शोध और लेखन के प्रति समर्पण के रूप में याद किया जा रहा है।
