यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jun 26, 2023 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
अधिकमास मेला: मधुश्रवां में ऐतिहासिक मलमास मेला 18 जुलाई से लगेगा, मनोवांछित फल पाने आते हैं श्रद्धालु
मधुश्रवां में ऐतिहासिक मलमास मेला 18 जुलाई से लगेगा। परंतु इसकी तैयारी अब तक शुरू नहीं हुई है। पुराणों में ...और पढ़ें

अभिषेक कुमार शेरे, अरवल। 18 जुलाई से शुरू होने वाला ऐतिहासिक मलमास मेला राजगीर के बाद अरवल जिले में च्यवन ऋषि की जन्मस्थली मधुश्रवां में लगता है।
आचार्यों का मानना है कि हिन्दुओं के सभी देवी-देवता इस अधिमास में मधुश्रवां में विचरण करते हैं। 33 करोड़ देवी-देवता को प्रसन्न करने एवं वांछित फलों की प्राप्ति के लिए तीर्थ यात्री निकटवर्ती जिले के साथ ही दूसरे प्रांतों से भी पूरे मास यहां प्रवास करते हैं।
भव्य मेले को आयोजन किया जाता है, जिसमें खेल-तमाशा, सर्कस, मौत का कुआं एवं जादूगरों का जमावड़ा लगता है। मान्यता है कि यहां के पवित्र तालाब में स्नान करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।
परंतु मेले को लेकर अब तक किसी तरह की तैयारी शुरू नहीं की गई है। तालाब में गंदगी का अंबार लगा है। स्नान करना तो दूर हाथ-पैर धोने लायक भी नहीं है। तालाब की दीवारें एवं सीढ़ियां जर्जर हो गई हैं।
पूर्व में मनरेगा योजना से साफ-सफाई की खानापूर्ति की गई थी। तालाब के जीर्णोद्धार के लिए कभी कारगर प्रयास नहीं किए गए। तालाब को जलकुंभी ने अपने आगोश में ले लिया है।
च्यवन ऋषि की है जन्मस्थली
पौराणिक ग्रंथों में वर्णित है कि मधुश्रवां में च्यवन ऋषि का जन्म हुआ था। उनके जन्म के समय हुए जल के श्राव से पवित्र सरोवर का निर्माण हुआ, जो आज भी अवस्थित है।
इस सरोवर में मलमास महीने में स्नान कर भगवान मधेश्वरनाथ का जलाभिषेक करने के उपरांत मनोवांछित फल मिलता है।
ऐतिहासिक स्थल पर पिंडदान करने गया जाने के क्रम में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान रामचंद्र जी महाराज ने पवित्र सरोवर में स्नान कर बाबा मधेश्वरनाथ का जलाभिषेक किया था।
वेद-पुराणों में यह भी वर्णित है कि मधुश्रवां में शाप-दोष से मुक्त होने के लिए नाग कन्याओं द्वारा छठव्रत किया गया था।
पवित्रता के साथ पवित्र सरोवर में स्नान कर छठव्रत करने एवं भगवान भास्कर (सूर्य) की अराधना करने से शाप-दोष से मुक्ति मिली थी।
उसी समय से इस ऐतिहासिक स्थल पर छठव्रत के दौरान श्रद्धालुओं की भीड़ जुटती है।
मलमास का धार्मिक महत्व
पुराण के अनुसार, जब सौर मास में दो अमावस्या आती हैं तभी मलमास होता है। इस माह को पुरुषोत्तम मास, अधिमास, अधिकमास भी कहा जाता है।
अग्नि पुराण के अनुसार जिस महीने में सूर्य की कोई संक्रांति नहीं होती है, वह मास मलमास होता है।
मलमास सभी मासों का अधिपति होता है। इस महीने में पवित्र स्नान कर पूजा-अर्चना एवं दान कर लोग दुख और पापों से मुक्ति पाते हैं।
