जहानाबाद। हजरत इब्राहिम और उनके बेटे हजरत इसमाइल की याद में ईद-उल-अजहा यानि बकरीद का त्योहार मनाया जाता है। इस अवसर पर मुसलामन भाई अल्लाह की रजा के लिए कुर्बानी करते हैं और दोगाना यानि ईद-उल-अजहा की नमाज अदा कर अल्लाह का शुक्र अदा करते हैं। साथ ही एक दूसरे से गले मिलकर बकरीद की मुबारकवाद पेश करते हैं। कहते है कि हजरत इब्राहिम ने अपने इकलौते बेटे को अल्लाह की राह में कुर्बान कर देते हैं लेकिन अल्लाह की मर्जी से बेटे की जगह दुम्बा कुर्बान हो जाता है और हजरत इसमाइल सही सलामत ¨जदा खड़े हो जाते हैं। उसी दिन से कुर्बानी का रिवाज आरंभ हुआ और हजरत मोहम्मद साहब ने कुर्बानी को फर्ज करार दे दिया। कुर्बानी सिर्फ गोश्त की नियत से नहीं की जाती है बल्कि इसमें रजा ए इराही छुपा है। इसके गोश्त का तीन हिस्सों में तक्सीम किया जाता है। एक हिस्सा गरीबों को, दुसरा अपने करीबी रिश्तेदारों और पड़ोसियों और तीसरा हिस्सा अपने लिए रखा जाता है। इसमें जरा भी गड़बड़ी करने पर कुर्बानी जाएज नहीं होती है। बकरीद के त्योहार की तैयारी महीनों से की जाती है।बकरा खरीदने से लेकर इसकी कुर्बानी तक लोग व्यस्त रहते हैं। इस अवसर पर मस्जिदों को आकर्षक तरीके से सजाया जाता है। त्योहार को लेकर सभी तैयारी पूरी कर ली गई है। इसलाम में सबसे बड़ा दो ही त्योहार है। एक ईद-उल-फित्र और दुसरा ईद-उल-अजहा। इस त्योहार में गरीबों पर खास ध्यान रखा जाता है। इन्हें विशेष रुप से मांस भेजा जाता है ताकि इस ईद में वह भी खुशी मनाएं। जिले के तमाम मस्जिदों एंव ईदगाहों में आज ईद-उल-अजहा की नमाज अता की जाएगी।

Posted By: Jagran

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