गोपालगंज: 2 बार कायाकल्प पुरस्कार जीतने वाला अस्पताल खुद 'बीमार', 3 डॉक्टरों पर 4 लाख लोगों का जिम्मा
कुचायकोट सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, दो बार कायाकल्प पुरस्कार जीतने के बावजूद, डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की भारी कमी से जूझ रहा है।

2 बार कायाकल्प पुरस्कार जीतने वाला अस्पताल खुद 'बीमार', 3 डॉक्टरों पर 4 लाख आबादी का जिम्मा
HighLights
दो बार कायाकल्प पुरस्कार विजेता कुचायकोट सीएचसी में स्टाफ की कमी।
16 स्वीकृत डॉक्टरों में से केवल 3 कार्यरत, 4 लाख आबादी का जिम्मा।
एक्स-रे, जीवनरक्षक उपकरण और आवश्यक दवाओं का भी अभाव।
संवाद सूत्र, कुचायकोट (गोपालगंज)। स्वच्छता, गुणवत्ता और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के लिए लगातार दो बार कायाकल्प पुरस्कार हासिल कर चुका कुचायकोट सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) इन दिनों चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों की कमी से जूझ रहा है।
करीब चार लाख आबादी और 222 गांवों की स्वास्थ्य सेवाओं का जिम्मा संभाल रहे 30 बेड के इस अस्पताल में प्रतिदिन करीब 100 मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। इसके बावजूद चिकित्सकों, जीएनएम और तकनीकी कर्मियों की कमी के कारण मरीजों को कई जरूरी सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है।
अस्पताल में चिकित्सकों के 16 पद स्वीकृत हैं, लेकिन प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी समेत केवल तीन चिकित्सक ही कार्यरत हैं। फरवरी में दो विशेषज्ञ चिकित्सकों की तैनाती हुई थी। इनमें एक विशेषज्ञ चिकित्सक डा. जितेंद्र कुमार लंबे समय से बिना सूचना के अनुपस्थित बताए जा रहे हैं।
वर्तमान में स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डा. वंदना कुमारी ही विशेषज्ञ सेवा दे रही हैं। नेत्र रोग विशेषज्ञ भी दूसरे अस्पताल से प्रतिनियुक्त हैं और सप्ताह में केवल तीन दिन सेवा देते हैं।
दंत रोग, शिशु रोग और जनरल फिजिशियन समेत कई महत्वपूर्ण पद लंबे समय से रिक्त हैं। आयुष चिकित्सक का पद भी करीब एक वर्ष से खाली है।
27 पदों पर सिर्फ तीन जीएनएम
नर्सिंग स्टाफ की कमी भी अस्पताल की व्यवस्था पर भारी पड़ रही है। जीएनएम के 27 पद स्वीकृत हैं, लेकिन केवल तीन जीएनएम के भरोसे मरीजों की देखभाल की जा रही है। मरीजों की संख्या के अनुपात में नर्सिंग स्टाफ की कमी से इलाज और देखभाल दोनों प्रभावित हो रहे हैं।
सप्ताह में तीन दिन ही एक्स-रे
अस्पताल में एक्स-रे मशीन उपलब्ध है, लेकिन इसके संचालन के लिए थावे से प्रतिनियुक्त तकनीकी कर्मी सप्ताह में केवल सोमवार, मंगलवार और बुधवार को ही सेवा देते हैं।
बाकी चार दिन एक्स-रे कक्ष बंद रहता है। ऐसे में जांच की जरूरत वाले मरीजों को निजी जांच केंद्रों का सहारा लेना पड़ता है और अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ता है।
छह लाख के उपकरण, पर प्रशिक्षित कर्मी नहीं
आपातकालीन उपचार के लिए अस्पताल में उपलब्ध संसाधनों का भी पूरा लाभ मरीजों को नहीं मिल पा रहा है। 26 मार्च को एक सामाजिक संगठन ने दुर्घटना पीड़ितों को गोल्डन ऑवर में बेहतर उपचार उपलब्ध कराने के लिए छह लाख रुपये से अधिक के अत्याधुनिक जीवनरक्षक उपकरण अस्पताल को उपलब्ध कराए थे।
इन्हें आपातकालीन कक्ष में स्थापित भी किया गया, लेकिन प्रशिक्षित तकनीकी कर्मियों की कमी के कारण इनका अपेक्षित उपयोग नहीं हो पा रहा है।
एंटी-रेबीज व सर्पदंश की दवा भी नहीं
अस्पताल में एंटी-रेबीज इंजेक्शन और सांप के काटने की दवा लंबे समय से उपलब्ध नहीं होने की बात सामने आ रही है। कुत्ता, सियार या अन्य जानवरों के काटने तथा सर्पदंश के मरीजों को दवा के लिए दूसरे अस्पतालों अथवा निजी केंद्रों का रुख करना पड़ता है।
ऐसे में कायाकल्प पुरस्कार पाने वाले अस्पताल में मानव संसाधन और जरूरी दवाओं की कमी स्वास्थ्य व्यवस्था की जमीनी स्थिति पर सवाल खड़े कर रही है।
क्या कहते हैं स्वास्थ्य प्रबंधक?
स्वास्थ्य प्रबंधक जितेंद्र सिंह ने बताया कि चिकित्सकों और अन्य स्टाफ की कमी के संबंध में जिला कार्यालय को पत्र भेजा गया है। उपलब्ध संसाधनों के माध्यम से बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है।
