गया । गया तीर्थ पांच कोस में विराजमान है। 10 दिनों से इन तीर्थो पर सूर्योदय के साथ तर्पण और कर्मकांड वैदिक मंत्र उच्चारण के साथ संपन्न हो रहा है। प्रेतशिला से लेकर धर्मारण्य तक एक सूत्र में बंधे पिंडदान के कर्मकांड को संपन्न कराने के लिए श्रद्धालुओं की आवाजाही हो रही है। समय के साथ पिंडदान की विधि और इसके करने की प्रक्रिया में बदलाव दिखता है।

पिंडदान एक, तीन, पांच, सात, 15 और 17 दिवसीय करने का विधान है। सर्वाधिक श्रद्धालु एक और तीन दिवसीय पिंडदान करते हैं। यानी फल्गु में तर्पण, विष्णुपद में पिंडदान और अक्षयवट में सुफल के बाद कर्मकांड का समापन होता है। इन दस दिनों में लाखों की संख्या में आए तीर्थयात्री उक्तस्थानों पर अपना कर्मकांड संपन्न कराकर वापस हो लिए हैं। अब श्रद्धालु एक दिन पिंडदान करने के लिए आ रहे हैं।

15 व 17 दिवसीय कर्मकांड करने वाले लोगों की भीड़ देखते ही बनती है। उत्तराखंड, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश के कुछ भाग और दिल्ली के कई श्रद्धालु पूर्ण कर्मकांड पूरा करने में लगे हैं। मेला क्षेत्र में इनकी मौजूदगी दिखती है।

दसवें दिन मंगलवार को गया कूप पर श्रद्धालु ने पिंडदान किया। इसके बाद तीर्थयात्री मुंड पिसता आदि गया और धौतपद पर भी जाकर पितरों की अक्षयफल की कामना के साथ पिंड को समर्पित किया। फल्गु नदी में जल प्रवाहित होने के बाद तीर्थयात्री शांति महसूस कर रहे हैं। उन्हें यहां पवित्र जल में अपने पितरों के प्रति जलांजलि देने का सबसे अच्छा अवसर मिला है। नदी में यह भी देखा गया है कि सिंघा बाजा बजाकर मानों पितृ का आह्वान किया जा रहा है। उन्हें जल ग्रहण करने का अनुरोध किया जा रहा है। यह सारी धार्मिक मान्यताएं समय के साथ नए रूप में देखने को मिल रही हैं।

Posted By: Jagran

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