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स्वतंत्रता के दीवाने: जब 1857 की क्रांति में टिकारी राज बनी क्रांतिकारियों की ढाल

Published: Wed, 12 Aug 2026 03:36 PM (IST)

1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में बिहार के मगध क्षेत्र के टिकारी राज और महारानी इन्द्रजीत कुंवर की भूमिका महत्वपूर्ण ...और पढ़ें

टिकारी राज का किला

टिकारी राज का किला

HighLights

  1. 1857 संग्राम में टिकारी राज ने क्रांतिकारियों को गुप्त सहयोग दिया।

  2. महारानी इन्द्रजीत कुंवर ने धन, भोजन, शस्त्र और आश्रय प्रदान किया।

  3. ब्रिटिश दमन के बावजूद टिकारी राज का किला सुरक्षित रहा।

आलोक रंजन, टिकारी। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में बिहार के मगध क्षेत्र की भूमिका महत्वपूर्ण रही थी। स्थानीय ऐतिहासिक परंपराओं, क्षेत्रीय इतिहासकारों के उल्लेख और अंग्रेजी प्रशासनिक अभिलेखों में उपलब्ध संदर्भों के आधार पर टिकारी राज की महारानी इन्द्रजीत कुंवर को इस संघर्ष में उल्लेखनीय सहयोगी के रूप में याद किया जाता है।

वे महाराजा हितनारायण सिंह की पत्नी थीं। क्रांतिकारियों को गुप्त रूप से सहयोग देने के कारण उनका नाम क्षेत्रीय इतिहास में सम्मान के साथ लिया जाता है।

1857 के विद्रोह के दौरान जब कई क्रांतिकारी अंग्रेजी दमन से बचते हुए मगध क्षेत्र से गुजर रहे थे, तब टिकारी राज की ओर से उन्हें आर्थिक सहायता, भोजन, शस्त्र और सुरक्षित आश्रय उपलब्ध कराने का उल्लेख मिलता है।

विशेष रूप से भागलपुर क्षेत्र के विद्रोहियों को सहायता दिए जाने की बात कही जाती है। महारानी इन्द्रजीत कुंवर ने आंदोलन की सुरक्षा के लिए अंग्रेजी प्रशासन को सूचना देने वाले मुखबिरों के खिलाफ भी कठोर रुख अपनाया था।

महारानी के साहस से जुड़ा एक चर्चित प्रसंग यह है कि उन्होंने फारसी योद्धा का वेश धारण कर सेना और तोपखाने के साथ सोन नदी की ओर प्रस्थान किया था। हालांकि, उनके संबंधी और स्वतंत्रता सेनानी बाबू फूल सिंह के आग्रह पर वे लौट आईं।

माना जाता है कि उनके प्रत्यक्ष रूप से युद्ध में उतरने से टिकारी राज पर अंग्रेजी कार्रवाई का खतरा बढ़ सकता था। उस दौर में टिकारी राज अपनी सैन्य शक्ति और तोपखाने के लिए भी प्रसिद्ध था। दाऊदनगर में पीतल की तोपें ढालने का कारखाना संचालित होने का उल्लेख मिलता है।

विद्रोह के बाद अंग्रेज अधिकारियों द्वारा जब्त किए गए कुछ हथियारों का संबंध टिकारी राज के शस्त्रागार से होने की आशंका व्यक्त की गई थी। इसके बाद अंग्रेज प्रशासन ने टिकारी किले से बड़ी संख्या में तोपें और हथियार जब्त किए।

पटना के तत्कालीन आयुक्त विलियम टेलर ने टिकारी राज पर विद्रोहियों की सहायता करने का संदेह व्यक्त करते हुए कठोर कार्रवाई की अनुशंसा की थी। हालांकि, बंगाल के लेफ्टिनेंट गवर्नर फ्रेडरिक हैलीडे ने टिकारी किले को ध्वस्त करने के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया।

इस तरह टिकारी राज प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई से बच गया। टिकारी राज के जानकार रजनीश बाजपेयी के अनुसार, महारानी इन्द्रजीत कुंवर का योगदान मुख्य रूप से गुप्त सहयोग, संसाधन उपलब्ध कराने और क्रांतिकारियों का मनोबल बढ़ाने तक सीमित था।

अंग्रेजी अभिलेखों में उनके योगदान का सीमित उल्लेख मिलता है, जबकि स्थानीय इतिहास और लोकस्मृतियों में उन्हें मगध की राष्ट्रभक्त वीरांगना के रूप में याद किया जाता है। आज टिकारी राज का वैभवशाली अतीत इतिहास के पन्नों में सिमटता जा रहा है।

राजमहल के ऐतिहासिक खंडहर अतीत और वर्तमान के बीच खड़ी उस विरासत की कहानी कहते हैं, जो कभी मगध में शक्ति, वैभव और स्वाभिमान का प्रतीक थी। महारानी इन्द्रजीत कुंवर का प्रसंग इसी विस्मृत होते गौरवशाली इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है।