सासाराम, प्रवीण दूबे। Chaitra Navratra 2021 बिहार के रोहतास जिले में तुतला भवानी शक्तिपीठ के आसपास की प्राकृतिक सुंदरता इतनी मनोरम है कि नवरात्र में यहां आने वाले श्रद्धालु हर साल यहां लौटने का संकल्प लेकर जाते हैं। तिलौथू थाना क्षेत्र अन्तर्गत तुतला भवानी धाम में पहाड़ी घाटी में ऊपर से गिर रहे प्रपात के अंदर शोणतटस्था शक्तिपीठ देवी के रूप में जगद्धात्री दुर्गा विराजमान हैं। पुराणों में शोणतटस्था शक्तिपीठ देवी के 51 पीठों में एक माना गया है। शोण तट पर विराजमान देवी को शोणाक्षी की संज्ञा दी गई है, जबकि शिव हैं भद्रसेन। सती का दक्षिणी नितंब यहां गिरा था। यही देवी आज तुतला भवानी के नाम से जानी जाती हैं। हालांकि पहाड़ी से सटकर बहने वाली सोन नदी अब यहां से लगभग चार किलोमीटर पूर्व में चली गई है। इसका प्रमाण पहाड़ी से सटा इसका छाडऩ है, जिसे लोग बाल कहते हैं।

सासाराम जिला मुख्यालय से है 25 किलोमीटर दूरी

यह स्थान जिले में तिलौथू प्रखंड में सोन नदी के पास कैमूर पहाड़ी के समीप अवस्थित है, जो जिला मुख्यालय से लगभग 25 किमी की दूरी पर है। यहां पर देवी प्रतिमा के अगल-बगल कई शिलालेख हैं। अधिकतर शिलालेख 12वीं सदी के स्थानीय खरवार राजा और कन्नौज-वाराणसी के गहड़वाल राजवंश के राजा गोङ्क्षवदचंद्र के नायक प्रतापधवल देव के समय के हैं। ये अपने को जपीलिया यानी जपला के निवासी लिखवाते हैं, जो सोन के दक्षिणी-पूर्वी तट पर अवस्थित है। उन्होंने यहां अपना पहला शिलालेख उत्कीर्ण कराया है, जो जगद्धात्री दुर्गा (तुतला भवानी) की प्राणप्रतिष्ठा के अवसर पर विक्रम संवत 1214 के ज्येष्ठ माह, कृष्ण पक्ष की चौथी तिथि, शनिवार 19 अप्रैल 1158 का है। कुछ शिलालेख अगले दिन रविवार के हैं। भाषा संस्कृत और लिपि प्रारंभिक नागरी है।

फ्रांसिस बुकानन ने भी किया है वर्णन

फ्रांसिस बुकानन अपने यात्रा क्रम में 14 दिसंबर 1812 को यहां गया था। उसने लिखा है कि यह स्थान प्राचीन काल से ही प्रसिद्ध जान पड़ता है। यहां देवी की दो प्रतिमाएं हैं, जिनमें एक अपेक्षाकृत नई है। एक पुरानी प्रतिमा है, जो अब टूट चुकी है। बुकानन के उल्लेख के अनुसार देवी की प्राचीन प्रतिमा खंडित हो चुकी थी, तब नायक प्रताप धवल देव ने दूसरी प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा कराई और अपना शिलालेख लिखवाया। नायक प्रताप धवल देव के शिलालेखों को हेनरी कोलब्रुक ने 1824 में पहली बार पढ़ा और जानकारियां दी। इस प्रकार यह पीठ 12वीं सदी के पूर्व में ही विख्यात हो चुका था।

मनोरम पहाड़ी की घाटी में विराजी हैं देवी जगद्धात्री

यह धाम तिलौथू से लगभग आठ किमी दक्षिण-पश्चिम में पहाड़ी की घाटी में है। यहां उत्तर-पश्चिम और दक्षिण-पूरब की ओर दो ऊंची पहाडिय़ों के बीच लगभग एक मील लंबी और हरियाली से भरी घाटी, सामने प्रपात और घाटी के बीच से कलकल कर बहती कछुअर नदी के पानी का दृश्य देखते ही बनता है। यह घाटी पूरब में जहां लगभग 300 मीटर चौड़ी है। वहीं, पश्चिम की ओर सिकुड़ती हुई केवल 50 मीटर रह जाती है, जहां पश्चिम में लगभग 180 फीट की ऊंचाई से प्रपात गिरता है। प्रपात के भीतर उसके दाएं बाजू में थोड़ी ऊंचाई पर एक चबूतरा है। यहां जाने के लिए दक्षिण की ओर से सीढ़ी बनी है। चबूतरे पर मां जगद्धात्री महिषमर्दिनी दुर्गा की प्रतिमा है।

गहड़वाल कालीन मूर्तिकला का सुंदर नमूना है प्रतिमा

यह प्रतिमा गहड़वाल कालीन मूर्तिकला का सुंदर नमूना है, जो एक ढाई फीट ऊंची छोटी पटिया पर उत्कीर्ण है। देवी अष्टभुजी हैं। इस प्रतिमा में दैत्य महिष की गर्दन से निकल रहा है, जिसे देवी अपने हाथों से पकड़ कर त्रिशूल से मार रही हैं। बाईं ओर ऊपर से नीचे क्रमश: ढाल, धनुष और खड्ग धारण की हुई हैं। कानों में कुंडल है और सिर पर मुकुट है। यहां एक छोटा अस्थाई मंदिर निर्मित कर दिया गया है, जिसकी दक्षिणी दीवाल में तीन भागों में बंटे शिलालेख का आधा भाग दब गया है।

मार्कंडेय पुराण में है शोणाक्षी देवी का वर्णन

ऐतिहासिक मामलों के जानकार शोध अन्वेषक डॉ. श्याम सुंदर तिवारी कहते हैं कि मार्कंडेय पुराण में सोन नद के किनारे जिस शोणाक्षी देवी का वर्णन है, वह यही देवी हैं। प्रताप धवल द्वारा प्राण-प्रतिष्ठित प्रतिमा अब खंडित हो चुकी है। फिर भी यहां सालों भर भक्त देवी दर्शन को पहुंचते रहते हैं। नवरात्रों में यहां बहुत अधिक भीड़ होती है। छाग बलि की भी परंपरा है। लोग दर्शन के अतिरिक्त पर्यटन के लिए और प्रपात में स्नान के लिए भी पहुंचते हैं।

यहां ऐसे पहुंचे: रोहतास जिला मुख्यालय सासाराम से राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या दो से ताराचंडी तिलौथू मुख्य मार्ग पर सेवही गांव के समीप से तुतला भवानी तक जाने के लिए सड़क की व्यवस्था है। वहीं डेहरी-अकबरपुर राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-119 पर तिलौथू प्रखंड मुख्यालय से आठ किलोमीटर पश्चिम तुतला भवानी तक जाने के लिए सड़क है।

(मंदिर के पास मनोरम जलप्रपात। जागरण)

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