जागरण संवाददाता, गया : हिंदू धर्म में प्रत्येक दिन का अपना एक खास महत्व होता है। उसी प्रकार पितृपक्ष यानी श्राद्ध भी बेहद महत्वपूर्ण है। सनातन धर्म में श्राद्ध एक कर्म है जो प्राचीनकाल से किया जा रहा है। मान्यता है कि जो लोग दुनिया में नहीं है। ऐसे में पितरों की शांति के लिए श्राद्धकर्म अवश्य किया जाना चाहिए। इससे उनकी आत्मा को शांति मिलती है और वह अपने को आशीर्वाद देते है। इसी उद्देश्य से पितृपक्ष में गयाजी में काफी संख्या में पिंडदानी आते हैं। श्राद्ध कर अपने पितरों को मोक्ष दिलाते है। 

आज पितृपक्ष का 14 वां दिन

गयाजी में चल रहे पितृपक्ष मेला अब ढलान की ओर है। मेला में सिर्फ एक एवं 17 दिवसीय पिंडदान करने वाले पिंडदानियों को देखा जा रहा है। जहां गया में स्थित पिंडवेदियों पर कर्मकांड कर रहे है। वहीं पितृपक्ष के 14 वें दिन फल्गु के पवित्र जल एवं दूध से पिंडदानी तर्पण कर रहे है। देव तर्पण चावल डालकर, जौ डालकर ऋषि तर्पण एवं तिल डालकर पितृ तर्पण किया जा रहा है। तर्पण को लेकर सुबह से फल्गु नदी में पिंडदानियों की भीड़ है। जहां पिंडदानी फल्गु के पवित्र जल एवं दूध से तर्पण कर रहे है।

दीया की रोशनी से जगमग करेगा विष्णुपद क्षेत्र

दीपदान को पितृ दीपावली भी कहा जाता है। दीपदान के अवसर पर शाम में विष्णुपद क्षेत्र को दीया से सजाया जाएगा। जिसका रोशनी से पूरा क्षेत्र प्रकाशमय होगा। विष्णुपद क्षेत्र के साथ-साथ फल्गु तट स्थित देवघाट एवं गजाधार घाट पर पिंडदानी दीपदान करेंगे। साथ ही पटाखें भी छोड़ेंगे। देवघाट पर रंगोलियां बनकर दीया को सजाया जाता है। उसके बाद दीया जलाया जाता है। मान्यता है कि दीपदान करने से पितरों के स्वर्ण जाने का मार्ग प्रकाशमय हो जाता है।

17 दिवसीय कर्मकांड करने वाले पिंडदानियों की अधिक संख्या

फल्गु तर्पण के साथ के दीपदान करने में 15 एवं 17 दिवसीय कर्मकांड करने वाले पिंडदानियों के संख्या अधिक रहता है। दोपहर बाद से पिंडदानी देवघाट और गजाधर घाट से दीया से सजाने में लग जाते है। वहीं शाम ढलते ही दीया को जलाया जाता है।

Edited By: Prashant Kumar Pandey