गया । आत्मा अमर है। आत्मा का वास जिस शरीर में होता है वह नश्वर है। मोक्ष की प्राप्ति होने तक मनुष्य बार-बार जन्म लेता है। पुराणों के अनुसार, श्राद्ध पक्ष में पितरों की आत्मा की शाति और मुक्ति के लिए पिंडदान किया जाता है, जो एक अहम कर्मकाड माना जाता है। पितृ पक्ष के दौरान हमारे पितर धरती पर आगमन करते हैं। इस वजह से उनकी पूजा, तर्पण या श्राद्ध का महत्व बतलाया गया है।

गयाजी में पितृपक्ष में आत्माओं की तृप्ति के लिए पिंडदान करने की परंपरा प्राचीनकाल से चली आ रही है। विशेषकर पितृपक्ष में अपने पूर्वजों को मोक्ष दिलाने को लेकर देश-विदेश हजारों पिंडदानी गया आते हैं। इसी क्रम में सोमवार को फल्गु नदी के तट पर स्थित सीताकुंड वेदी पर पिंडदानियों की भीड़ दिख रही थी। सीताकुंड वेदी पूरी तरह से वैदिक मंत्रोच्चारण ने गूंज रहा था। सीताकुंड वेदी के आसपास पिंडदानियों द्वारा कर्मकांड किया जा रहा था। सीताकुंड के आसपास जगह की कमी के कारण पिंडदानी फल्गु नदी की तपती रेत पर अपने पितरों को मोक्ष की कामना कर रहे थे। तेज धूप का प्रभाव इन पिंडदानियों पर देखने को नहीं मिल रहा है। फल्गु नदी में पानी का बहाव काफी कम गया है। नदी में पानी की धारा कम होने से पिंडदानी रेत पर बैठक कर कर्मकांड की विधि संपन्न कर रहे थे। कर्मकांड समाप्त होने के बाद पिंडदानियों ने माता सीता के मंदिर तथा सीताकुंड में पूजा-पाठ करने के लिए घंटों लाइन में खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। फल्गु में देवघाट से लेकर सीताकुंड तक पिंडदानियों की भीड़ दिखी।

पंडित मुन्ना पांडे ने कहा कि त्रेता युग में जब भगवान राम चौदह वर्ष के वनवास काट रहे थे तो उन्हें पिता दशरथ जी के परलोक गमन की सूचना मिली। एक वर्ष पश्चात के बाद पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ कर्मकांड करने गया आए थे। श्राद्धकर्म हेतु आवश्यक सामग्री लेने भाई लक्ष्मण के साथ बाजार गए थे। भगवान श्रीराम के आने में देर हो गई। तभी माता सीता के सामने रेत से दशरथ जी का हाथ निकला और उन्होंने सीताजी से कहा पुत्री मुझे पिंड का दान दो। माता सीता ने कहा, पिताश्री सामग्री लेकर आपके पुत्र नहीं आए हैं। तब दशरथ ने कहा कि तुम मुझे श्रद्धा के साथ फल्गु के बालू पिंड बनाकर दे दो। इसी से हमें मोक्ष की प्राप्ति हो जाएगी। माता सीता बालू का पिंड बनाकर कर्मकांड की विधि संपन्न कराई। तब से उक्त स्थान सीताकुंड वेदी के नाम से जाना जाता है।

Posted By: Jagran

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