इमामगंज (गया), संवाद सूत्र। हमारे यहां के गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल पूरी दुनियां में दी जाती है। सांप्रदायिक सौहाद्र की ऐसी मिसाल भारत में ही दिखती है जो पूरी दुनियां को संदेश दे जाती है। एक बार ऐसा ही कुछ हुआ ज्ञान और मोक्ष की नगरी गया में। कोरोना काल में दिखी ऐसी इंसानियत ने सबका सीना चौड़ा कर दिया है। दरअसल गया के इमामगंज में एक हिंदू महिला की मौत कोरोना से हो गई। तब अपने आगे नहीं आए। लेकिन मुस्लिम समाज के युवकों ने इस दौरान आगे आकर न सिर्फ परिवार को सांत्‍वना दी बल्कि अर्थ को कंधे पर उठाकर श्‍मशान तक ले भी गए। वहां अंत्‍येष्टि होने तक रुके रहे। इस वाकये की हर ओर सराहना हो रही है। लोगों का कहना है कि कोरोना कोरोना महामारी ने रिश्ते से तार-तार कर दिया है। लेकिन ऐसे में यह कदम आंखें खोलने वाला है।

बीमारी से हो गई थी पार्वती देवी की मौत

शनिवार को प्रखंड के तेतरिया गांव निवासी दिग्विजय प्रसाद की 58 वर्षीय पत्नी पार्वती देवी की मौत लंबी बीमारी के कारण हो गई। मौत की खबर गांव में फैलते ही सन्नाटा पसर गया। कोरोना से मौत की आशंका में ग्रामीण अपने-अपने घर का दरवाजा बंद कर अंदर हो गए। उनके दाह संस्कार में जाना मुनासिब नहीं समझा। इस बात की सूचना रानीगंज के अल्पसंख्यक समाज के लोगों के बीच पहुंची। आपसी सौहार्द की मिसाल पेश करने वे आगे बढ़े। धर्म, जाति, संप्रदाय के बंधन से उपर उठकर इंसानियत दिखाई। महिला के अंतिम संस्कार के लिए एक दर्जन अल्पसंख्यक समाज के नौजवान तेतरिया गांव पहुंचे। वहां रोते बिलखते परिवार को सांत्वना दी। इसके बाद अर्थी को उठाया और श्मशान घाट तक पहुंचाया। वहां मृतक के स्वजनों ने हिंंदू रीति रिवाज के साथ दाह संस्कार किया। दाह संस्कार में मो. सगीर आलम, माे. रफीक मिस्त्री, मो सुहैल, फारूक उर्फ लड्डन, हाफिज कलीम, हेरार आलम, मो शारिक, मो उमर और मृतका का पुत्र निर्णय कुमार, विकास कुमार और बसंत यादव शामिल थे।

Edited By: Vyas Chandra