गयाजी में जमींदोज हो रहा का कुर्कीहार गढ़, घरों और गलियों में बिखरी बुद्धकालीन धरोहरें
गया जिले के वजीरगंज में स्थित ऐतिहासिक कुर्कीहार गढ़ और बुद्धकालीन धरोहरें प्रशासनिक उपेक्षा के कारण नष्ट हो रही हैं।

जमींदोज हो रहा कुर्कीहार गढ़, घरों व गलियों में बिखरी बुद्धकालीन धरोहरें
HighLights
कुर्कीहार गढ़ प्रशासनिक उपेक्षा से अतिक्रमण और गंदगी का शिकार।
बुद्धकालीन दुर्लभ मूर्तियां घरों, गलियों में बिखरी पड़ी हैं।
संरक्षण हेतु वैज्ञानिक सर्वेक्षण और स्थानीय संग्रहालय की मांग।
रवि भूषण, वजीरगंज (गया)। गया जिले का वजीरगंज प्रखंड ऐतिहासिक और पुरातात्विक धरोहरों से समृद्ध है, लेकिन प्रशासनिक उपेक्षा के कारण यहां की अमूल्य विरासत धीरे-धीरे नष्ट हो रही है। इसका प्रमुख उदाहरण कुर्कीहार गांव स्थित ऐतिहासिक गढ़ है।
कभी बौद्ध धर्म और कला का महत्वपूर्ण केंद्र रहा यह स्थल आज अतिक्रमण, गंदगी और बदहाली का शिकार है। गढ़ के आसपास ही नहीं, बल्कि गांव की गलियों, घरों और खेतों में भी बुद्धकालीन दुर्लभ मूर्तियां बिखरी पड़ी हैं।
स्थानीय इतिहासकारों के अनुसार, कुर्कीहार गढ़ का ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व काफी अधिक है। मान्यता है कि इसके नीचे प्राचीन सभ्यता से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण अवशेष और दुर्लभ मूर्तियां दबी हुई हैं।
समय-समय पर खुदाई के दौरान यहां से काले पत्थर से निर्मित भगवान बुद्ध, तारा और अवलोकितेश्वर सहित विभिन्न देवी-देवताओं की प्राचीन मूर्तियां मिलती रही हैं।
इन अवशेषों से क्षेत्र के समृद्ध बौद्ध इतिहास का पता चलता है। ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने दशकों पहले इस स्थल को अपने संरक्षण में लिया था।
कागजों पर संरक्षण, धरातल पर बदहाली
विडंबना है कि संरक्षित घोषित होने के बावजूद कुर्कीहार गढ़ की स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। गढ़ की चारदीवारी नहीं होने से इसका बड़ा हिस्सा अतिक्रमण की चपेट में आ चुका है। टीले के आसपास झोपड़ियां और मकान बना लिए गए हैं। परिसर के निकट कचरे का अंबार लगा रहता है। सु
रक्षा के लिए गार्ड की नियुक्ति के बावजूद ऐतिहासिक स्थल की प्रभावी निगरानी नहीं हो पा रही है। पुरातत्व विभाग का सूचना बोर्ड भी देखरेख के अभाव में जंग खा रहा है।
मूर्तियों का हो रहा अपमान, संरक्षण की दरकार
सबसे चिंताजनक स्थिति गांव में बिखरी प्राचीन मूर्तियों की है। घरों की दीवारों, चबूतरों, गलियों और खेतों में पड़ी इन मूर्तियों का उचित संरक्षण नहीं हो रहा है।
कहीं इन पर कपड़े सुखाए जाते हैं, तो कहीं इन्हें मवेशी बांधने के लिए खूंटे की तरह इस्तेमाल किया जाता है। इससे दुर्लभ पुरातात्विक धरोहरों के नष्ट होने का खतरा बढ़ गया है।
स्थानीय बुद्धिजीवियों और ग्रामीणों का मानना है कि वैज्ञानिक तरीके से सर्वेक्षण और खुदाई कराई जाए तो कुर्कीहार से बौद्ध इतिहास से जुड़े कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं। इससे वजीरगंज को बौद्ध पर्यटन के मानचित्र पर पहचान मिल सकती है तथा स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी बढ़ सकते हैं।
लोगों ने पुरातत्व विभाग से गढ़ को अतिक्रमणमुक्त कराने, चारदीवारी निर्माण, नियमित सुरक्षा और वैज्ञानिक उत्खनन की मांग की है। साथ ही गांव में बिखरी मूर्तियों की पहचान कर उन्हें सुरक्षित रखने के लिए स्थानीय संग्रहालय स्थापित करने की जरूरत जताई है।
कुर्कीहार के अलावा हंसराज पहाड़ी श्रृंखला, पुनावां, केनार, धरमपुर, बिशुनपुर और हसरा सहित प्रखंड के कई गांवों में भी प्राचीन मूर्तियां खंडित और लावारिस अवस्था में पड़ी हैं। इन धरोहरों को समय रहते नहीं सहेजा गया तो क्षेत्र का महत्वपूर्ण इतिहास हमेशा के लिए मिट सकता है।
