300 रुपये से शुरू किया कारोबार, किसी ने टोटो खरीदा तो किसी ने चॉकलेट बेची; ऐसे आत्मनिर्भर बनीं गया की 4 महिलाएं
बाराचट्टी में स्वयं सहायता समूहों से जुड़कर महिलाएं बचत, ऋण और छोटे रोजगार के माध्यम से अपने परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत कर रही हैं।

गया के बाराचट्टी की सोती देवी, राधा देवी और प्रियंका। फाइल
HighLights
स्वयं सहायता समूहों से जुड़कर महिलाएं आर्थिक रूप से सशक्त हो रही हैं।
राधा ने बकरी पालन से चॉकलेट हॉकर तक का सफर तय किया।
प्रियंका ने पति की मृत्यु के बाद शिक्षिका बनकर आत्मनिर्भरता पाई।
संवाद सूत्र, बाराचट्टी (गया)। बाराचट्टी में स्वयं सहायता समूहों से जुड़कर महिलाएं बचत, ऋण और छोटे रोजगार के माध्यम से परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत कर रही हैं।
महिलाएं बच्चों की पढ़ाई और परिवार की जरूरतों में आर्थिक योगदान दे रही हैं। चार महिलाओं की अलग-अलग कहानियां बताती हैं कि हौसले, मेहनत और अवसर मिलने पर महिलाएं तस्वीर बदल सकती हैं।
बनी मिसाल : बकरी से चॉकलेट तक राधा का सफर
बाराचट्टी की रोही पंचायत के बांक गांव की राधा देवी की कहानी संघर्ष से सफलता तक की है। वर्ष 2012 में जीविका स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं राधा के परिवार की आर्थिक स्थिति काफी कमजोर थी।
दो बेटे, एक बेटी और सास की जिम्मेदारी पति आनंद पासवान पर थी। वह चार पहिया वाहन चलाते थे। वर्ष 2007 में चाकंद रेलवे गुमटी के पास हादसे के बाद राधा ने उन्हें वाहन चलाने से रोक दिया।
इसके बाद बेरोजगारी बड़ी चुनौती बन गई। वर्ष 2016 में राधा ने समूह से 30 हजार रुपये का ऋण लेकर बकरी पालन शुरू किया, लेकिन बकरियां बीमारी की चपेट में आ गईं।
उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपने विवेक से ऋण की राशि वापस कर दी। वर्ष 2021 में 50 हजार रुपये का ऋण लेकर घर से चॉकलेट हॉकर का काम शुरू किया।
पति गांव-गांव और किराना दुकानों पर चॉकलेट बेचने लगे। कारोबार बढ़ने पर तीन माह पहले एक लाख रुपये का ऋण लेकर इसे और विस्तार दिया।
आज बेटी इंटर में और एक बच्चा आठवीं कक्षा में पढ़ रहा है। बड़ा बेटा दसवीं तक पढ़ाई के बाद प्रदेश में काम कर रहा है। राधा के पास अपना घर, जमीन और आत्मनिर्भर जीवन है।
अंधेरे से उजाले तक : बारा की बहू प्रियंका की संघर्ष गाथा
बाराचट्टी प्रखंड के तेतरिया गांव की प्रियंका कुमारी की जिंदगी संघर्ष और हौसले की कहानी है। वर्ष 2012 में भगहर गांव की बेटी प्रियंका का विवाह बारा पंचायत में हुआ।
दो वर्ष बाद पति की सांप के काटने से मृत्यु हो गई। उस समय गोद में छोटा बेटा बिट्टू था। पति के निधन के बाद परिवार के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया।
सामाजिक दबाव के कारण कुछ समय तक वह घर में ही रहीं, लेकिन पढ़ाई की ललक ने उन्हें आगे बढ़ने का हौसला दिया।
प्रियंका ने गांव के निजी विद्यालय में दो-तीन हजार रुपये के मानदेय पर पढ़ाना शुरू किया। आय कम पड़ती तो शाम में बच्चों को ट्यूशन पढ़ातीं।
दिन में बेटे की देखभाल और स्कूल में पढ़ाने के बाद रात में अपनी पढ़ाई करतीं। कई बार केवल तीन-चार घंटे ही सो पाती थीं। वर्ष 2017-18 में एनआईओएस से डीएलएड किया।
वर्ष 2023 में बीपीएससी परीक्षा उत्तीर्ण की। आज वह प्राथमिक विद्यालय तेतरिया में शिक्षिका हैं और अपने बेटे बिट्टू को भी पढ़ा रही हैं। उनकी सफलता गांव की बेटियों के लिए प्रेरणा बनी है।
तीन सौ से शुरू किया सफर, आज बनी आत्मनिर्भर
भगवती गांव की सोती देवी ने वर्ष 2015 में महज 300 रुपये से चॉकलेट और टॉफी बेचने का काम शुरू किया। परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी।
पति के सहयोग की कमी के कारण घर चलाने की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। कारोबार बढ़ाने के लिए उन्होंने जीविका समूह से 30 हजार रुपये का ऋण लिया।
समय पर राशि जमा नहीं होने के कारण ब्याज सहित उन्हें एक लाख 54 हजार रुपये चुकाने पड़े। इसके बावजूद उन्होंने कारोबार बंद नहीं किया।
बीते वर्ष सरकार से मिले दस हजार रुपये को उन्होंने जनरल स्टोर और होटल के काम में लगाया। सोती का कहना है कि दो लाख रुपये की सहायता मिलने की बात कही गई थी।
यदि राशि मिलती है तो कारोबार को और आगे बढ़ाया जा सकता है। वह गांव में दस हजार रुपये की सहायता पाने वालों की सही जांच की मांग भी करती हैं।
आज सोती अपने दम पर परिवार संभाल रही हैं। उनके दो बेटे इंटर और स्नातक की पढ़ाई कर रहे हैं तथा मां के काम में भी हाथ बंटाते हैं।
कर्ज नहीं, हौसले की सवारी : टोटो ने बदली विमला की जिंदगी
जयगीर पंचायत के बरवाडीह गांव की विमला देवी ने दिखाया कि छोटे ऋण का सही इस्तेमाल परिवार की आर्थिक स्थिति बदल सकता है।
स्वयं सहायता समूह की कम्युनिटी मोबिलाइजर विमला ने वर्ष 2023 में जीविका समूह से ऋण लिया और उससे टोटो खरीदा। उन्होंने टोटो पति मनोज कुमार को सौंप दिया।
मनोज दिनभर टोटो चलाते हैं। इससे होने वाली आमदनी से घर की जरूरतें, बच्चों की पढ़ाई और ऋण की किस्त पूरी हो रही है।
विमला कहती हैं कि समूह से जुड़ने से पहले उनकी पहचान घर तक सीमित थी। अब गांव में उन्हें ‘दीदी’ के नाम से जाना जाता है।
उनके अनुसार, समूह की बचत और ऋण ने जरूरत के समय किसी के सामने हाथ फैलाने की मजबूरी नहीं आने दी। उनके लिए यह केवल कर्ज नहीं, बल्कि आत्मविश्वास का साधन है। एक टोटो ने उनके परिवार को आर्थिक सहारा देने के साथ आत्मनिर्भरता की राह भी दिखाई है।
