बाराचट्टी। बाराचट्टी प्रखंड के अति नक्सल प्रभावित तिलेटाड़ गांव के लोगों का दर्द आखिर कौन सुनेगा? कब तक यहां के लोग अपने कंधे पर बीमार मरीज को लेकर अस्पताल पहुंचाते रहेंगे? नई नवेली दुल्हनों को मुख्य पथ से घर तक पहुंचने के लिए सोचना पड़ेगा? कुछ ऐसा ही तिलेटाड़ गांव का हाल, जो अति दुर्गम पहाड़ियों से घिरा है। इस गांव तक जाने के लिए पहाड़ी से ही रास्ता है। इस कारण बारिश व सामान्य दिनों में भी ग्रामीणों को सोचना पड़ता है।

बता दें कि प्रखंड के तिलेटाड़ गांव में नीतीश सरकार में भी विकास की किरणें नहीं पहुंची हैं। बिजली पहुंचने से गांव में बदलाव दिखता है, लेकिन पहुंच पथ का अभाव ग्रामीणों को परेशान कर देता है। पहाड़ी रास्ते ही इस गांव तक पहुंचना आज भी मजबूरी है। गांव के बासदेव सिंह भोक्ता कहते हैं कि हम लोगों के लिए न तो कोई सरकार है और ना ही कोई पदाधिकारी, क्योंकि आज भी हमलोग भगवान के भरोसे जी रहे हैं। वे कहते हैं कि हमारी बहू की तबीयत अचानक खराब होने पर स्वजन के साथ खाट पर टांग कर अस्पताल लेकर गए। टुनु सिंह भोक्ता व द्वारिका सिंह भोक्ता कहते है कि हम लोगों का गांव लगभग चार किमी पहाड़ की ऊंचाई पर बसा है। यहां वाहन पहुंचने का रास्ता झारखंड के राजपुर के तरफ से है, लेकिन हमलोग बाराचट्टी प्रखंड और बिहार राज्य में हैं। कारू सिंह भोक्ता कहते हैं कि गांव में स्कूल नही है। सात किमी दूर धनगांई गांव में बच्चे पढ़ाई करने जाते हैं। चार बजे भोर में रात का बना खाना खाकर कोंचिग के लिए घर से निकल जाते हैं और शाम में स्कूल की पढ़ाई कर घर लौटते हैं। वस्तुत: यह परेशानी सड़क न रहने के कारण है। विनोद सिंह भोक्ता बताते है कि मुख्यमंत्री पर ही आस है। पंचायत प्रतिनिधियों को छोड़ दीजिए, विधायक व सांसद तक हमलोगों की सुध नहीं लेते हैं, तो सड़क की समस्याओं के समाधान की क्या आस की जाए।

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