गया [रविभूषण सिन्हा]। जूही-गुलाब हर जगह एक जैसे ही होते हैं, पर इस मिट्टी में खिले इन फूलों की खुशबू खास है, क्योंकि इसमें है आजादी की दीवानगी का खाद-पानी। यहां आज भी हर दिन बच्चे बैठकर सुनते हैं अपने पूर्वजों की गाथा। लहू उबल पड़ता है और सब मिलकर गाने लगते हैं देश के स्वाभिमान के गीत।  

बिहार के गया जिले में वजीरंगज प्रखंड का एक गांव विशुनपुर। यह यहां के लिए तीर्थस्थल है। यहां आने वालों के सिर जिस झोपड़ी की चौखट पर झुकते हैं, वहां कभी जमती थी आजादी के दीवानों की महफिल। आज की पीढ़ी ने भी इसे बड़े जतन से संभाल रखा है। यहां हर दिन स्वतंत्रता संग्राम के योद्धाओं की जयंती और पुण्यतिथि मनाई जाती है। 

यहां एक वाटिका है। इसी में बनी हुई है एक कुटिया। आज भी उसी रूप में, जब आजादी से पहले थी। दरअसल, यहीं स्वतंत्रता सेनानियों की बैठकें होती थीं। आजादी के बाद इसे उसी रूप में संभालकर रखा गया। यहां एक क्लब का गठन किया गया-स्वतंत्रता सेनानी क्लब। क्लब का निर्माण यहां के स्वतंत्रता सेनानी रहे स्व. शीतल सिंह के पुत्रों डॉ. अमर सिंह सिरमौर और शंभूशरण सिंह ने कराया।

यहां हर दिन बैठकी लगती है। आजादी के किस्से कहे-सुने जाते हैं। देशभक्ति से भरे गीत-संगीत का कार्यक्रम होता है। अंग्रेजों से लडऩे वाले शीतल सिंह ने इसी कुटिया में 2 मार्च, 2008 को अंतिम सांस ली थी। उन्होंने आगे की पीढ़ी को आजादी की यह धरोहर सौंप दी, लोगों ने इसे जिंदा रखा है। इसकी साज-सज्जा भी देखने लायक है। दीवारों में स्वतंत्रता संग्राम के नेताओं और क्रांतिकारियों की तस्वीरें टंगी हैं। 

क्लब में अखबार, पत्रिकाएं, ऐतिहासिक पुस्तकें आती हैं। यहां गांव के दस-पांच लोग हमेशा बैठे मिल जाएंगे। जब ढोल-तबले और हारमोनियम पर आपन देश हो भइया के बोल गूंजते हैं तो राष्ट्रवंदन अंगड़ाई ले रहा होता है। इतना ही नहीं, युवाओं के लिए प्रशिक्षण शिविर आदि भी लगाए जाते हैं। दंगल, फुटबॉल, कबड्डी आदि प्रतियोगिताएं भी होती हैं।

लोग बताते हैं कि शीतल सिंह ने 15 अगस्त 1995 को इस कुटिया को यह रूप दिया था, उनके गुजरने के बाद भी यह उसी स्वरूप में है। यहां प्रवेश करते ही एक अनूठा अहसास होता है। गांव के वयोवृद्ध समाजसेवी चन्द्रशेखर तिवारी अभी इसके मुख्य सचेतक और सुनील तिवारी अध्यक्ष हैं। 

स्वतंत्रता सेनानी के पुत्र शंभूशरण सिंह सचिव, डॉ. अमर सिंह सिरमौर पुस्तकालयाध्यक्ष और रंजीत कुमार पांडेय कोषाध्यक्ष हैं, जो इसकी देखभाल कर रहे। यहां लोग बड़ी श्रद्धा के साथ आते हैं और मत्था टेकते हैं। 

Posted By: Kajal Kumari