गया । हैजा रोग होने पर लोग गांव छोड़कर बधार एवं पेड़ के नीचे रहते थे। इस बीमारी से काफी संख्या में लोगों की मौत होती थी।

उक्त बातें गुरारू प्रखंड के बारा गांव निवासी 70 वर्षीय आनंद मोहन मिश्रा ने कहीं। उन्होंने कहा कि हैजा भी एक संक्रामक रोग था। किसी एक व्यक्ति को हैजा होने पर पूरा गांव चपेट में आ जाता था। दो-तीन दिनों में गांव में काफी संख्या में लोगों की मौत हो जाती है। मौत के डर से लोग गांव छोड़कर बधार तथा पेड़ के नीचे एक-एक पखवारे तक रहते थे। वहीं आग पर लिट्टी बनकर किसी तरह पेट भरते थे। चापाकल नहीं रहने के कारण कुएं का पानी गरम कर पीते थे। दवा के रूप में सिर्फ गरम पानी पीते थे। बचाव के लिए दवा भी नहीं थी। इसके अभाव में गांव में सौ से अधिक लोगों की मौत हो जाती थी।

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चेचक से भी जाती थी

कई लोगों की जान

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चेचक होने में गांव में काफी संख्या में लोगों की मौत हो जाती थी। यह संक्रमण भी काफी तेजी से फैलता था। उक्त बातें मथुरापुर डीह निवासी 65 वर्षीय राम बदन सिंह ने कहीं। उन्होंने कहा कि चेचक पूरे शरीर में होता था।

शरीर के किसी भी जगह सुई रखने की जगह नहीं रहती थी। जख्म से काफी तेज जलन होने से मौत हो जाती थी। दवा के नाम पर सिर्फ जख्म पर अरहुल के फूल को पीसकर लेप लगाया जाता था। जिसके घर में चेचक होता जाता उसमें कोई व्यक्ति नहीं जाता था। लोगों पूरी तरह से सरसों के तेल एवं हल्दी खाना छोड़ देते थे। रूखा-सूखा भोजन कर किसी तरह रहते थे। दवा के रूप में सिर्फ तुलसी के पत्ते और गरम पानी इस्तेमाल करते थे। इसके बाद भी कोरोना वायरस से कम खतरनाक था। लॉकडाउन का पूरी तरह पालन करें।

Posted By: Jagran

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