गया । प्रखंड के जीवनबिगहा निवासी 70 वर्र्षीय बासुदेव साव कहते हैं, पहले जब दवाइया सभी जगहों पर उपलब्ध नहीं हुआ करती थीं, तब ग्रामीण महामारी से बचने के लिए घरेलू नुस्खों को अपनाते थे। रोगग्रस्त लोगों से दूरी बनाकर रखा जाता था। रोग से बचने के लिए लोग गाव छोड़कर चले जाते थे। महामारी की चपेट में आकर कई लोग असमय काल के गाल में समा गए थे।

उन्होंने कहा, महामारी छुआछूत व गंदगी से फैलती है। महामारी फैलने पर चिकित्सकों की टीम एक-दो दिन बाद पहुंच पाती थी। सड़क व वाहन की सुविधा नहीं हुआ करती थी। लोग मरीज को खटिया पर लिटाकर शहर के अस्पताल में ले जाते थे। हैजा, डायरिया, टीबी, तपेदिक ये सभी रोग संक्रमण से फैलते हैं। अगर यह एक बार महामारी का रूप धारण कर लेती है तो अगर समय पर इलाज नहीं हुआ तो इसके शिकार लोगों की मौत हो जाती है। वह बताते हैं, पुराने जमाने में दवा व चिकित्सकों की कमी हुआ करती थी। दस वर्ष की उम्र में हमने डायरिया का प्रकोप देखा था। मेरे दादा-दादी रोग से बचने के लिए ननिहाल लेकर चले गए थे। वह कहते हैं, कोरोना वायरस का संक्रमण भी महामारी बन चुका है। लिहाजा, इससे बचने के लिए लोगों को एक-दूसरे के संपर्क नहीं रहना चाहिए। साफ-सफाई का विशेष ध्यान देना चाहिए। लोगों को सरकार व स्वास्थ्य विभाग के दिशा-निर्देशों का पालन करना चाहिए।

Posted By: Jagran

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