गया । कोरोना वायरस ने आज महामारी का रूप अख्तियार किया है। देश में इससे पहले भी इस तरह की खतरनाक बीमारी ने लोगों को डराया है। आजादी के बाद से देश ने इस तरह के कई महामारी को चुनौती के रूप में लेकर उससे निजात पाई है। दैनिक जागरण ने समाज में कुछ बुजुर्गाें से बातचीत कर यह जाना कि आखिर उनके जमाने में महामारी से कैसे बचा जाता था। उन बुजुर्गो को इस बार की महामारी को लेकर क्या संदेश है। बुजुर्गो ने अपनी राय रखी।

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चेचक होने पर गोबर लिपाई वाले रूम में मरीज को सुलाया जाता था

1950 में चेचक ने भयंकर रूप धरा था। तब मेरी आयु 14 साल की थी। चेचक से संक्रमित व्यक्ति को गाय के गोबर से लिपाई किए हुए जमीन पर सबसे अलग कर सुलाया जाता था। उसके आसपास नीम की पत्तियां रखी जाती थी। घर-परिवार के लोग संक्रमित से दूर रहते थे। साफ-सफाई पर पूरा ध्यान दिया जाता था। गांव के देवी मंदिर में पूजा पाठ भजन होती थी। मरीज का कपड़ा नित्य गर्म पानी में धोया जाता था। कोराना वायरस को लेकर एहतियात बरतने की आवश्यकता है। जनता क‌र्फ्यू भी संक्रमण से बचने की एक सराहनीय पहल है। लोग घबराएं नहीं। जागरुकता के साथ सचेत रहें।

केडी सिंह, महारानी रोड, गया, 83 वर्ष (फोटो 202)

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प्लेग फैलने पर हाथी पर गांव में इलाज करने आए थे डॉक्टर साहब

1965 में प्लेग महामारी बनी थी। मेरे गांव सैदपुर में दो लोग मर गए थे। घाटो, घुंघरिया में 25 आदमी की मृत्यु हो गई थी। उस समय मैं मैट्रिक का छात्र था। मोहाने नदी में पानी थी। लिहाजा बीमार लोगों का इलाज करने के लिए महंथ जी के हाथी पर चढ़कर डॉक्टर साहब गांव में पहुंचे थे। उस समय सबको गर्म पानी पीने की सलाह दी गई थी। गर्म खाना-नाश्ता खाने को कहा था। कपड़े को भी गर्म पानी में धोकर सुखाकर ही पहनते थे। संक्रमित व्यक्ति को अलग सुरक्षित कमरे में रखा जाता था। कोरोना भी महामारी घोषित हुई है। लिहाजा, हर किसी को जागरूक होकर अपनी जिम्मेवारी समझनी चाहिए। कुछ दूर रहकर बात करनी चाहिए।

मुनेश्वर सिंह, सैदपुर, गया, 70 वर्ष (फोटो 203)

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हैजा, प्लेग में सफाई का रखते थे पूरा ख्याल, आज भी जरूरत है

हैजा, प्लेग से बहुत लोग मर गए थे। मेरे गांव रैली में एक ही परिवार के सात लोग मर गए थे। उस समय भी लोग साफ-सफाई का पूरा ख्याल रखते थे। संक्रमित लोग से बचने के लिए कई लोग गांव से दूर दूसरे गांव में चले जाते थे। उस समय गांव में कैंप लगाकर बीमार लोगों का इलाज होता था। पानी चढ़ाया जाता था। लोगों को उस समय भी सचेत रहने की सलाह दी जाती थी। आज कोरोना आदमी से आदमी में फैल रहा है। जरूरत है समझदारी से जागरूक रहने की। हाथ धोना है, मास्क लगाना है।

ब्रज किशोर सिंह, रैली, खिजरसराय, 76 वर्ष (फोटो 204)

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चूहों के मरते ही आसपास के

गांवों में हो जाता था अलर्ट

जब गांव में चूहे मरने लगते थे तो लोग समझ जाते थे कि प्लेग आ गया। मेरे दादाजी उस समय मंदिर में पूजा पाठ कर लोगों को प्रसाद देते थे। खीर बनाकर बीमार लोगों को दिया जाता था। संक्रमित व्यक्ति को भीड़ से अलग कर दिया जाता था। आज कोराना में संदिग्ध व्यक्ति को जो होम कोरंटाइन किया जा रहा है वह उसी का एक रूप है। यह बहुत जरूरी भी है। जड़ी-बूटी की दवा उस समय में कारगर मानी जाती थी।

श्यामनंदन प्रसाद, पचलख, गया, उम्र 73 वर्ष (फोटो 205)

Posted By: Jagran

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