गया। मगध विश्वविद्यालय स्नातकोत्तर प्राणी विज्ञान विभाग में शिक्षकों की कमी के कारण पढ़ाई बाधित है। वहीं, स्पेशल पेपर की पढ़ाई बंद हो गई है।

वर्तमान में मात्र चार सेमेस्टर में नामांकित छात्रों का भविष्य दो शिक्षकों के जिम्मे है। जैसे भी हो, दो शिक्षक समय पर कोर्स पूरा कराते हैं, पर इससे उन पर अतिरिक्त दबाव भी पड़ता है। विभाग की स्थापना वर्ष 1969 में विवि परिसर स्थित अपने भवन में हुई। संस्थापक विभागाध्यक्ष डॉ. श्याम बिहारी सिंह रहे। उन्होंने यूके से पीएचडी की उपाधि प्राप्त की थी। विभाग के प्रथम बैच के छात्र रहे प्रो. अशोक कुमार सिंह दिल्ली विवि के विभागाध्यक्ष व शांतिस्वरूप भटनागर अवार्ड से सम्मानित अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त कीट वैज्ञानिक रहे। वहीं, डॉ. विजय कुमार सिंह आईसीएआर में वरीय वैज्ञानिक, मो. रजाउद्दीन रांची विवि के कुलपति रहे। विभाग में 1978 में जुलाजिकल कांग्रेस का अधिवेशन आयोजित किया गया, जिसमें देश भर से 580 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। वर्ष 1980 में गया जिले के सभी सरकारी विद्यालयों के जंतु विज्ञान के शिक्षकों को एक माह का प्रशिक्षण दिया गया। वर्ष 1985 में इंटरनेशनल कांग्रेस हुआ, जिसमें 22 देशों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। इस कांग्रेस की खास बात यह रही कि सात फैलो ऑफ रॉयल सोसाइटी के उपाध्यक्ष भी शामिल हुए। वर्ष 1987, 1991 व 1998 में भी नेशनल कांग्रेस का आयोजन किया गया। इंडियन सांइस कांग्रेस एसोसिएशन के जुलोजिकल सेक्शन के अध्यक्ष विभागाध्यक्ष डॉ. श्याम बिहारी सिंह व डॉ. बीएन पांडेय रहे।

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दो शिक्षक हैं कार्यरत

विभाग में शिक्षकों के स्वीकृत पद 10 हैं, लेकिन कार्यरत शिक्षक दो हैं। विभागाध्यक्ष डॉ. सुनील कुमार सिंह व प्राध्यापक डॉ. सिद्धनाथ प्रसाद दीन। विभाग का पुस्तकालय समृद्ध है, लेकिन पुस्तकालयाध्यक्ष नहीं हैं। सरकार द्वारा ग्रांट बंद कर दिए से जर्नल की परंपरा समाप्त हो गई। पहले का जर्नल ही शोधार्थी छात्रों के काम आ रहा है। प्रयोगशाला को समृद्ध रखने के लिए चार लैब टेक्निशियन हैं। वातानुकूलित वर्गकक्ष व सभागार है।

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बंद है स्पेशल पेपर की पढ़ाई

विभाग में पहले पारा साइटोलॉजी, इन्टोमोलॉजी, इथालॉजी की पढ़ाई होती थी। इसके लिए विभाग में विशेषज्ञ प्राध्यापक थे। लेकिन विशेषज्ञ प्राध्यापक की सेवानिवृत्ति के पश्चात इथालॉजी व पारा साइटोलॉजी जैसे स्पेशल पेपर की पढ़ाई बंद हो गई। इंट्रमेंटटेंशन सेंटर में शोध के लिए दुर्लभ उपकरण हैं। जिसका उपयोग वर्तमान में विभाग के प्रथम तल पर संचालित वॉयोटेक के छात्रों द्वारा किया जा रहा है। प्राध्यापक डॉ. एसएनपी दीन बताते हैं कि जरूरत पारंपरिक शिक्षा को रोजगार से जोड़ने की है। विभाग में अप्लाइड जुलॉजी की पढ़ाई होनी चाहिए। जैसे एक्वा कल्चर, सेरीकल्चर, एपी कल्चर आदि। उन्होंने कहा कि जल्द ही विभाग और केंद्रीय संस्थान सीटीआरआई रांची व सिल्क बोर्ड बंगलुरू के बीच एमओयू होगा। इसके लिए कुलपति की सहमति प्राप्त हो चुकी है। एमओयू हो जाने से यहां के छात्र व शोधार्थी वहां जा सकेंगे और वहां के छात्र व शोधार्थी यहां आकर शोध कार्य को पूर्ण कर सकेंगे।

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कहते हैं विभागाध्यक्ष

विभागाध्यक्ष डॉ. सुनील कुमार सिंह कहते हैं कि पहले विभाग में 16 सीटो पर नामांकन लिया जाता था। तब 10 शिक्षक हुआ करते थे। 90 के दशक में राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण सीटों की संख्या में वृद्धि हुई और शिक्षकों की संख्या में कमी आती गई। वर्तमान में जो छात्र क्लास करने आ रहे हैं वे पढ़ने वाले छात्र हैं। वे कहते हैं कि अगर सभी नामांकित छात्र क्लास करने आ जाएं तो प्रयोगशाला में जगह नहीं मिलेगी।

Posted By: Jagran