मोतिहारी। वासंतिक नवरात्र की शुरुआत बुधवार को कलश स्थापना के साथ हो गई। देश में महामारी के रूप में फैल रही कोरोना वायरस के कारण जिले के सभी मंदिरों सहित देवी मंदिरों में भी ताला जड़ गया है, ताकि लोग समूह में ना रहे। जिले में कभी भी सार्वजनिक स्थलों पर पूजा पंडालों में मां की आराधना नहीं हो रही हैं। लोग घरों में ही पूरे विधि-विधान से देवी की आराधना में जुटे है। कई लोग मोबाइल से अपने पंडितों से दिशा-निर्देश लेकर देवी की श्रद्धा के साथ पूजा कर रहे है। इस संबंध में जिले के रामगढ़वा स्थित बंधुबरवा गांव स्थित प्रसिद्ध सिंहासनी माई मंदिर के पूजारी सह प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित सत्यदेव मिश्र ने कहा कि देवी व भगवान की आराधना के लिए मंदिर जाना आवश्यक नहीं है। भगवती सभी जगहों पर विराजमान हैं। हृदय से जब भी उन्हें बुलाएंगे, भगवती वहीं नजर आएंगी। उन्होंने कहा कि दानव रूपी कीटाणु के नाश के लिए घर में भगवती की आराधना के साथ'ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते'। पंडित श्री मिश्र ने बताया कि सूक्ष्म एवं परजीवियों से मनुष्य का युद्ध नया नहीं है, ये तो सृष्टि के आरंभ से अनवरत चल रहा है, और सदैव चलता रहेगा। इससे लड़ने के लिए हमने हर हथियार खोज भी लिया था, मगर अहंकार, लालच, स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने की हठधर्मिता सब नष्ट कर रही है।

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महामारी की तरह था रक्तबीज राक्षस, देवी ने किया था संहार

जासं, मोतिहारी : रक्तबीज एक ऐसा दानव था जिसे यह वरदान था की जब-जब उसके लहू की बूंद इस धरती पर गिरेगी तब-तब हर बूंद से एक नया रक्तबीज जन्म लेगा जो बल, शरीर और रूप से मुख्य रक्तबीज के समान ही होगा। इसलिए जब भी इस दानव को अस्त्रों, शस्त्रों से मारने की कोशिश की जाती, उसके लहू की बूंदों से कई रक्तबीज पुन: जीवित हो जाते। रक्तबीज दैत्यराज शुंभ और निशुंभ का मुख्य सेनानायक था और उनकी सेना का मां भगवती के विरुद्ध प्रतिनिधित्व कर रहा था। शिव के तेज से प्रकट माहेश्वरी देवी, विष्णु के तेज से प्रकट वैष्णवी, ब्रह्मा के तेज से ब्राह्मणी भगवती के साथ मिलकर दैत्यों से युद्ध कर रही थी। जब भी कोई देवी रक्तबीज पर प्रहार करती उसकी रक्त की बूंदों से अनेको रक्तबीज पुन: जीवित हो उठते। तब देवी चंडिका ने काली मां को अपने क्रोध से अवतरित किया। मां काली विकराल क्रोध वाली और उनका रूप ऐसा था की काल भी उन्हें देख कर डर जाये। देवी ने कहा कि तुम इस असुर की हर बूंद का पान कर जाओ जिससे की कोई अन्य रक्तबीज उत्पन्न ना हो सके। ऐसा सुनकर मां काली ने रक्तबीज की गर्दन काटकर उसे खप्पर में रख लिया ताकि रक्त की बूंद नीचे ना गिरे और उसका सारा खून पी गयी। जो भी दानव रक्त से उनकी जिह्वा पर उत्पन्न होते गए उनको खाती गई। इस तरह अंत हुआ रक्तबीज और उसके खून का।

Posted By: Jagran

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