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नेपाल में आपदा के बाद बदले शव प्रबंधन के नियम, DNA जांच से होगी मृतकों की पहचान

By Sanjay UpadhyayEdited By: Dharmendra Singh
Published: Tue, 01 Sep 2026 03:29 PM (IST)

नेपाल सरकार ने ग्लेशियर फटने के बाद आपदा पीड़ितों की पहचान के लिए शव प्रबंधन नियमों में बदलाव किए हैं। ...और पढ़ें

जो घर बच नहीं पाया, उसे इस पार से ताकते रहने की मजबूरी कितना कष्ट दे रही, इन किशोरियों से अधिक कोई नहीं समझ सकता।त्रिशूली नदी की विनाशकारी बाढ़ सब बहा ले गई और साथ आया मलबा विवशता का दलदल बनकर राह इनको अपने टूटे घर की ओर जाने से रोक रहा। जागरण

जो घर बच नहीं पाया, उसे इस पार से ताकते रहने की मजबूरी कितना कष्ट दे रही, इन किशोरियों से अधिक कोई नहीं समझ सकता।त्रिशूली नदी की विनाशकारी बाढ़ सब बहा ले गई और साथ आया मलबा विवशता का दलदल बनकर राह इनको अपने टूटे घर की ओर जाने से रोक रहा। जागरण

HighLights

  1. अज्ञात शवों की पहचान डीएनए जांच से अब अनिवार्य।

  2. आपदा पीड़ितों के शव प्रबंधन नियमों में महत्वपूर्ण संशोधन।

  3. शरीर के अंगों को भी 'शव' की नई परिभाषा में शामिल।

संजय उपाध्याय, काठमांडू (नेपाल)। नेपाल सरकार नेपाल-तिब्बत सीमा पर ग्लेशियर फटने के बाद मची तबाही में लापता व मारे गए नेपाल व अन्य देशों के नागरिकों की पहचान के लिए गंभीर है।

इस सिलसिले में गृह मंत्रालय की ओर से भोटे कोशी व त्रिशूली नदी के जल-प्रलय में मारे गए नेपाल व अन्य देशों के लोगों के अज्ञात शवों की पहचान के लिए आवश्यक निर्देश जारी किए गए हैं।

गृहमंत्रालय की साइट पर जारी सूचना के अनुसार सभी अज्ञात शवों के सैंपल डीएनए जांच के लिए सुरक्षित किए जाने हैं।

इस काम के लिए नेपाल सरकार के नियमों के अनुरूप संबंधितों की जिम्मेदारी सुनिश्चित की गई है। सरकार की मूल निर्देशिका की धारा में संशोधन किया गया है। इसके अनुसार हस्तानांतरण नहीं हो पाने की स्थिति में शवों के साथ प्रबंधन शब्द जोड़ा गया।

यह सबकुछ इस कारण से किया गया है कि आपदा पीड़ितों की पहचान आसानी से हो सके। सरकार ने अज्ञात व लावारिस शव प्रबंधन (पहला संशोधन) निर्देशिका को स्वीकृति दे दी है।

इसका मुख्य उद्देश्य लावारिस शवों, विशेषकर आपदा में जान गंवाने वालों के शवों का व्यवस्थित और वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन करना है।

नेपाल प्रहरी नियमावली के तहत लाए गए इस संशोधन में शवों के अस्थायी प्रबंधन, डीएनए सुरक्षित रखने और शरीर के अंगों को भी 'शव' की परिभाषा में शामिल करने जैसे महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं।


आपदा पीड़ितों के लिए सरकार की ओर से विशेष प्रावधान किए गए हैं। यदि प्रारंभिक जांच में यह सुनिश्चित हो जाता है कि मृत्यु किसी आपदा के कारण हुई है, तो पोस्टमार्टम केवल व्यक्ति की पहचान के लिए आवश्यक परीक्षणों तक ही सीमित रहेगा।

डीएनए और पहचान सुरक्षित रखने के संबंध में बताया गया है कि लावारिस शव या शरीर के किसी अंग का प्रबंधन करने से पहले उसकी पहचान के लिए डीएनए सहित आवश्यक नमूने एकत्र करना अब अनिवार्य है।

शवों को स्वजन को वापस देने के लिए लावारिस शवों को पहचान चिह्न के साथ सुरक्षित रूप से जमीन के नीचे रखे जाएंगे। यदि भविष्य में उनके असली वारिस या स्वजन का पता चलता है, तो वे शव या शरीर के अंग उन्हें सौंप दिए जाएंगे। आपदा मृतकों के लिए यह स्थान जिला आपदा प्रबंधन समिति द्वारा तय किया जाएगा।

'शव' और 'शव प्रबंधन' की नई परिभाषा

ताजा घटना के बाद अब शरीर के किसी भी पाए गए अंग या हिस्से को कानूनी रूप से 'शव' के रूप में वर्गीकृत माना जाएगा। साथ ही 'शव प्रबंधन' का मतलब अब केवल पूर्ण अंतिम संस्कार नहीं है, बल्कि शवों को अस्थायी रूप से सुरक्षित रखना भी इसमें शामिल किया गया है।

लावारिस शवों के जो भी विवरण केंद्रीय पोर्टल में दर्ज किए जाएंगे, उनकी सूचना अब अनिवार्य रूप से सार्वजनिक संचार माध्यमों (न्यूज़, रेडियो आदि) से प्रसारित या प्रकाशित की जाएगी, ताकि लापता लोगों के परिवार उन तक पहुंच सकें।

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