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East Champaran News : एमजीसीयू में खर्च से लेकर टेंडर तक पर सवाल, ऑडिट में मिली कई वित्तीय अनियमितताएं

Published: Tue, 15 Sep 2026 08:05 PM (IST)

महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय (एमजीसीयू) मोतिहारी में सीएजी की लेखा परीक्षा समिति ने वित्तीय अनियमितताओं पर आपत्ति जताई है, जिसमें ...और पढ़ें

महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय।

महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय।

जागरण संवाददाता, मोतिहारी (पूर्वी चंपारण)। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की ओर से कराई जानेवाली आडिट के तहत महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय में वित्तीय कार्यों की समीक्षा करने पहुंची लेखा परीक्षा समिति ने कई बिंदुओं पर आपत्ति जताई है।

आडिट रिपोर्ट, प्रधान निदेशक लेखा परीक्षा (केंद्रीय) कार्यालय द्वारा एमजीसीयू के छात्र आकाश कुमार द्वारा मांगी गई जानकारी को सूचना के अधिकार के तहत उपलब्ध कराई गई है। इसमें विगत तीन वित्तीय वर्षों 2022-23, 2023-24 एवं 2024-25 के बजट, आवंटन एवं व्यय की चर्चा है।

उल्लेखनीय है कि लेखा परीक्षा में दीक्षा समारोह में भी अनियमित व्यय की चर्चा की गई है। वहीं, रिपेयरिंग एवं मेंटेनेंस में अनियमित व्यय भी सवालों के घेरे में है। टेंडर की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े किए गए हैं। एक सिंगल रिपेयरिंग प्रोजेक्ट की जगह कार्य विभाजन कर निर्धारित सीमा को बाइपास करना बताया गया है।

स्थाई कैंपस के निर्माण की लागत एवं विलंब पर टिप्पणी

एमजीसीयू के लेखा वर्ष 2024-25 के अंतर्गत निर्माण कार्य के अभिलेखों की नमूना जांच में पाया गया कि निर्माण कार्य के लिए एमजीसीयू एवं सीपीडब्ल्यूडी मुजफ्फरपुर के बीच 14 जून 2024 को एमओयू का कार्य पूर्ण हुआ।

एमजीसीयू द्वारा डीपीआर तैयार करने के लिए सीपीडब्ल्यूडी को पत्र निर्गत किया गया। सीपीडब्ल्यूडी द्वारा निर्माण कार्य अनुमानित लागत 850 करोड़ बताया गया तथा डीपीआर तैयार करने के लिए 1.25 करोड़ रुपये की मांग की गई।

सीपीडब्ल्यूडी द्वारा 30 मई 2025 को डीपीआर की प्रति भेजी गई। इसमें 261.83 एकड़ में 1338.83 करोड़ रुपये निर्माण कार्य के लिए इस्टिमेटेड बताया गया। इसके बाद एमजीसीयू द्वारा 12 जून 2025 को डीपीआर शिक्षा मंत्रालय को स्वीकृति के लिए सौंपा गया।

स्वीकृति में विलंब पर टिप्पणी करते हुए बताया गया है कि कार्य में देरी होने से लागत अत्यधिक बढ़ जाता है। विलंब के कारण छह माह में अनुमानित लागत 58 प्रतिशत बढ़ गया।

रजिस्ट्रार व वित्त अधिकारी न हाेने पर सवाल

रिपोर्ट में कहा गया है कि वित्तीय वर्ष 2016-17 में इस विश्वविद्यालय का गठन कर इसे कार्यरत किया गया था। लेकिन नौ वर्ष बीत जाने के बाद के पश्चात रजिस्ट्रार एवं वित्त अधिकारी की नियुक्ति नहीं की गई है। केवल अतिरिक्त प्रभार से दोनों पद का कार्य कराया जा रहा है।

इसके कारण सुचारू रूप से कार्य नहीं हो पा रहा है। ऐसी स्थिति में गड़बड़ी की संभावना बनी रहती है। रजिस्ट्रार एवं वित्त अधिकारी की नियुक्ति नौ वर्ष बीत जाने के बाद भी नहीं किया जाना यूनिवर्सिटी एक्ट के अनुपालन में उदासीनता दर्शाता है।

कार्यशैली एवं प्रक्रियाओं पर भी सवाल

इसके अलावा अधिक भुगतान, रिकार्ड का अभाव, सेमिनार के आयोजन में व्यय राशि, चिकित्सा प्रतिपूर्ति मद में अनियमित भुगतान इत्यादि पर भी टिप्पणी की गई है। लेखा परीक्षा के दौरान रिसर्च प्रमोशन स्कीम के अंतर्गत 18 असिस्टेंट प्रोफेसर को रिसर्च करने के लिए दी जाने वाली सीड मनी को लेकर भी प्रक्रियाओं का हवाला देते हुए आपत्ति दर्ज कराई गई है।

इसको लेकर संस्थान का पक्ष है कि महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय मोतिहारी पारदर्शिता, उचित प्रक्रिया तथा जहां भी आवश्यक हो, सुधारात्मक कार्रवाई के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। यह प्रारंभिक आडिट (लेखा-परीक्षण) टिप्पणियां हैं, न कि अंतिम निष्कर्ष।

विश्वविद्यालय ने अप्रैल 2026 में संबंधित अभिलेखों, दस्तावेजी साक्ष्यों और संलग्नकों के साथ 256 पृष्ठों की विस्तृत बिंदुवार प्रतिउत्तर आडिट अधिकारियों को पहले ही प्रस्तुत कर दी है। अब तक सीएजी कार्यालय द्वारा कोई अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की गई है।

यह आडिट रिपोर्ट नहीं है। यह लेखा परीक्षा समिति का प्राथमिक अवलोकन है, जिसका विश्वविद्यालय ने जवाब दिया है। हमारे साक्ष्यों और जवाब के बाद उनकी कुछ और भी जिज्ञासा हो सकती है, जिसका जवाब विश्वविद्यालय देगा। उसको देखने, परखने के बाद जो उनका प्रतिवेदन होगा उसको ही आडिट रिपार्ट कहा जा सकता है।

- प्रो. प्रसून दत्त सिंह, मुख्य कुलानुशासक, एमजीसीयू