मोतिहारी । राष्ट्रीय बालिका दिवस की पूर्व संध्या पर पं. उगम पाण्डेय महाविद्यालय की प्राध्यापिका व विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़ी प्रो. पुतुल सिन्हा ने कहा कि बेटियां सौभाग्य है और बेटियां भविष्य है। वे अपने सपनों को हर रोज नई उड़ान देती ,नया आकाश तलाश रही है। लेकिन, यह सब इतना आसान नहीं था। काफी मशक्कत के बाद आज बेटियों को नई जमीन मिली है। प्राचीन समय से ही लड़कियों को लड़कों से कम समझा जाता रहा है। भ्रूण हत्या,बाल विवाह जैसी रुढि़वादी समस्या हुआ करती थी,जिसके चलती शिक्षा ,पोषण ,कानूनी अधिकार और चिकित्सा जैसे मानवाधिकार उन्हें नई दिए जाते थे। कितु हमारी सोच बदली और आधुनिक समय में लोगों को जागरुक करने की लिए कई प्रयास किए है। इतिहास गवाह है कि लंबे समय तक कहीं जगह पर लड़कियों को बोझ समझा जाता था, लोग लड़कियां ना पैदा हों इसके लिए दुआएं मांगने लगे। गर्भ में ही बेटियों को मारा जाने लगा। नतीजा लिगानुपात में अंतर आने लगा। साल 2001 की जनगणना में 1000 बालक पर 927 बालिका यह पूरे समाज और सरकार के लिए चेतावनी थे। 2011 की जनगणना में फिर से निराशा हाथ लगी। अब यह संख्या घटकर 1000 बालक में 818 हो गई। जब केंद्र में 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी प्राथमिकताओं में गिरते लिगानुपात को सबसे ऊपर रखा तो बदलाव की बयार आ गई 22 जनवरी 2015 को एक ऐसी योजना की शुरुआत हुई जिसमें जमीनी स्तर पर कार्य किया गया और उसमें उन्होंने पानीपत, हरियाणा में इस कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए एक नारा दिया -बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ। उन्होंने अपने भाषण में कहा कि यदि बहू पढ़ी-लिखी चाहिए तो बेटी को पढ़ाइए यह हमारी जिम्मेदारी है। धीरे-धीरे बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना शिशु लिगानुपात को रोकने में काफी मददगार साबित हुई महिला और बाल विकास मंत्रालय स्वास्थ्य परिवार कल्याण मंत्रालय और शिक्षा मंत्रालय के संयुक्त प्रयासों से चलाई जा रही इस योजना में कन्या शिशु के प्रति समाज के नजरिए में खासा योगदान दिया है। जिसका असर 2020 के जनसंख्या में स्पष्ट दिखाई देने लगा ।इस योजना के तहत सबसे पहले कन्या भ्रूण हत्या रोकने का प्रयास किया गया 100 चुनिदा राज्यों में जहां शिशु दर कम था वहां वहां यह अभियान जागरूकता अभियान चलाया गया। इस योजना के तहत केंद्र सरकार ने सुकन्या समृद्धि योजना चलाई जो बेटियों के भविष्य को संवारने में मददगार साबित हुई।

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