रक्सौल के जगधर में दूध से बदली किसानों की तकदीर, हर दरवाजे पर गाय-भैंस, घर-घर समृद्धि
रक्सौल के जगधर गांव में पशुपालन और दुग्ध उत्पादन ने ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति को मजबूत किया है, जिससे गांव ...और पढ़ें

जगधर गांव में दुधारु पशुओं के साथ किसान। जागरण
नूतनचंद्र त्रिवेदी, रक्सौल (पूर्वी चंपारण)। प्रखंड क्षेत्र के पलनवा जगधर पंचायत के जगधर गांव में विभिन्न जातियों के लोग निवास करते हैं। आज इनकी पहचान पशुपालन और दुग्ध उत्पादन के रूप में स्थापित हो चुकी है, जिससे गांव के लोगों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो रही है।
गांव के लगभग सभी घरों में दुधारू पशु हैं, जिनकी देखरेख की जिम्मेदारी महिलाओं ने संभाल रखी है। घर के कामकाज और बच्चों को विद्यालय भेजने के बाद ये महिलाएं पशुओं की सेवा और उनके खान-पान का ध्यान रखती हैं।
यहां हर दरवाजे पर विभिन्न नस्लों की गाय और भैंस देखी जा सकती हैं। इस गांव के लोग श्वेत क्रांति के माध्यम से आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहे हैं।
दुग्ध संग्रह केंद्र से ग्रामीणों को दूध का उचित दाम मिलने से उनकी आमदनी में वृद्धि हुई है। नियमित आय से ग्रामीणों और उनके बच्चों का जीवन स्तर भी सुधरा है। दुधारू पशुओं से प्रतिदिन सात सौ से आठ सौ लीटर दूध का उत्पादन होता है।
अधिक दूध उत्पादन के कारण मदर डेयरी ने गांव में अपना दूध संग्रह केंद्र खोला है। उत्पादित दूध का कुछ हिस्सा गांवों में या दुकानों में भेजा जाता है, जिससे पशुपालकों को नकद राशि मिलती है।
शेष दूध मदर डेयरी को बेचा जाता है। यह गांव कृषि और दूध से प्राप्त आय पर निर्भर है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है। आजादी के बाद डेयरी उद्योग में कई बदलाव आए हैं, जिससे गरीब किसानों को रोजगार मिला है। एक समय था जब यह गांव दूध की कमी से जूझ रहा था, लेकिन अब यह दुग्ध उत्पादन में अग्रणी गांव बन गया है।
दूध उत्पादन से बनी इस गांव की पहचान
किसानश्री सुबोध कुमार और पंचायत की पूर्व मुखिया अनु देवी का कहना है कि यह गांव आर्थिक रूप से पिछड़ा था, लेकिन दूध उत्पादन ने गांव के लोगों की तकदीर बदल दी है।
मेहनती ग्रामीणों ने दूध उत्पादन में अपनी अलग पहचान बनाई है। फसल उत्पादन के साथ-साथ दुग्ध उत्पादन में यह गांव अग्रणी बना है।
हर 10 वें दिन होता है भुगतान
पशुपालक कृष्ण यादव, विजय यादव, राजेश यादव, विनोद यादव, अशोक यादव सहित अन्य पशुपालकों का कहना है कि वे अपने पशुओं को घास और पत्ते देते हैं। बरसात के दिनों में ब्रांड भी देते हैं, जिससे गाय और भैंस अधिक दूध देती हैं।
उनके पास गाय की साहीवाल, गीर, पटनहिया, जर्सी और भैंस की मुर्रा व भुअर नस्ल की पशुएं हैं। किसानों ने बताया कि उन्हें महीने में तीन बार भुगतान मिलता है, और दूध के पैसे हर 10वें दिन सीधे उनके खाते में आ जाते हैं। इससे मवेशियों के लिए आवश्यक दाना और आहार की व्यवस्था हो जाती है।
पशुपालन से गांव की तस्वीर बदली है। पशुपालकों को दुग्ध का नकद भुगतान मिल जाता है, जिससे उनकी जरूरतें पूरी होती हैं। इसके अलावा, खेती के लिए जैविक खाद के रूप में गोबर का उपयोग किया जाता है या इसे किसानों को बेचा जाता है।
गौतम कुमार, प्रखंड कृषि पदाधिकारी, रक्सौल
