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दरभंगा में बिना रेगुलेशन वाले पीएचडी धारक ही बना रहे उच्च शिक्षा के नियम, यूजीसी पर गंभीर सवाल

Published: Thu, 13 Aug 2026 06:53 PM (IST)

आरटीआई से खुलासा हुआ है कि यूजीसी के जिन सदस्यों ने पीएचडी की मान्यता पर फैसले लिए, उन्होंने स्वयं बिना ...और पढ़ें

इसमें प्रतीकात्मक तस्वीर लगाई गई है।

इसमें प्रतीकात्मक तस्वीर लगाई गई है।

HighLights

  1. यूजीसी सदस्यों ने बिना केंद्रीय रेगुलेशन के पीएचडी की थी।

  2. शिक्षाविदों ने पार्ट-टाइम पीएचडी को नियमित के समान मानने पर आपत्ति जताई।

  3. अधिकारियों पर अपनी डिग्रियों को वैध करने के लिए नियम शिथिल करने का आरोप।

जागरण संवाददाता, दरभंगा । विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी की नीतियों और कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सूचना का अधिकार यानी आरटीआई के तहत मिली जानकारी से यूजीसी के जिन सदस्यों ने पीएचडी की मान्यता से जुड़ा अहम फैसला लिया था, उन्होंने स्वयं उस समय पीएचडी की थी जब कोई केंद्रीय रेगुलेशन लागू ही नहीं था।

आरटीआई कार्यकर्ता डा. रघुबर प्रसाद सिंह की ओर से मांगी गई जानकारी के जवाब में यूजीसी ने 11 अगस्त 2026 को स्वीकार किया कि वर्ष 2009 से पहले पीएचडी के लिए कोई एकीकृत केंद्रीय नियम नहीं था। उस दौरान प्रत्येक विश्वविद्यालय अपने अध्यादेश के तहत शोध डिग्रियां जारी करता था।

22 फरवरी 2017 को हुई यूजीसी की बैठक में शामिल सदस्य भी इसी पुरानी और बिना रेगुलेशन वाली व्यवस्था के तहत पीएचडी धारक हैं।

यूजीसी ने 17 मार्च 2017 की एक सार्वजनिक सूचना का हवाला देते हुए पार्ट-टाइम और फुल-टाइम पीएचडी को समान मानने की बात कही है।

शिक्षाविदों ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा है कि जहां एक ओर बीएड और एलएलबी जैसे प्रोफेशनल कोर्स केवल नियमित में ही मान्य हैं, वहीं पीएचडी जैसी सर्वोच्च शैक्षणिक डिग्री के लिए पार्ट-टाइम और वैकल्पिक रास्तों को छूट दी जा रही है।

पांच-प्वाइंट मापदंड का उल्लंघन

वर्ष 2009 के रेगुलेशन के लागू होने के बाद पुरानी पीएचडी के लिए पांच मापदंड-जैसे नियमित उपस्थिति, शोध पत्र का प्रकाशन, सेमिनार प्रस्तुति और बाह्य विशेषज्ञ से मूल्यांकन अनिवार्य किए गए थे।

शिक्षाविदों का आरोप है कि जो अधिकारी खुद बिना किसी सख्त नियम या पार्ट-टाइम मोड से पीएचडी करके उच्च पदों पर पहुंचे हैं, वे पारदर्शी नीति बनाने के बजाय अपनी डिग्रियों को नियमित के बराबर बनाए रखने के लिए नियमों को शिथिल कर रहे हैं। उन्होंने मांग की है कि यूजीसी इस संबंध में अपना ठोस शैक्षणिक आधार स्पष्ट करे।