दरभंगा। विश्व के समस्त राष्ट्रों के निर्माण में शिक्षकों की ही भूमिका रही है। चाहे राष्ट्र पूंजीवादी हो या फिर साम्यवादी अथवा भारत की तरह। राष्ट्र कैसा होगा, राष्ट्र किस ओर जाएगा इसकी आधारशिला भी गुरु ही रखते हैं। तभी तो आचार्य चाणक्य ने कहा है शिक्षक साधारण नहीं होता प्रलय और निर्माण दोनों ही उसकी गोद में पलते हैं। शिक्षक सिर्फ क्लास रूम में पढ़ानेवाला ही नहीं होता है। बल्कि किसी भी प्रकार के ज्ञान से परिचित कराने वाला व्यक्ति गुरु है। स्वयंसेवी संस्था डॉ. प्रभात दास फाउंडेशन एवं लनामिविवि के पीजी समाजशास्त्र विभाग के संयुक्त तत्वावधान में शिक्षक दिवस की पूर्व संध्या पर मंगलवार को आयोजित 'राष्ट्र निर्माण में शिक्षकों की भूमिका' विषयक संगोष्ठी को मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित करते हुए प्रख्यात राजनीतिक ¨चतक डॉ. जितेंद्र नारायण ने ये बातें कही। राष्ट्रवाद की विस्तृत व्याख्या की। कहा कि हम भी राष्ट्रवाद के पोषक हैं, पर हमारा राष्ट्रीय विचार मानवतावाद से ओतप्रोत है। इसलिए भारत विश्व गुरु कहलाता रहा है। पीजी संस्कृत विभाग के वरीय शिक्षक डॉ. जयशंकर झा ने कहा कि गुरु को ऐसे ही देवताओं से भी ऊपर का दर्जा नहीं दिया गया है। गुरु मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्माण कर राष्ट्र निर्माण की ओर अग्रसर करता है। वस्तुत: असत्य से सत्य का ज्ञान गुरु ही कराता है। प्रो. दिलीप कुमार झा ने कहा कि मानव जीवन में माता-पिता के बाद सबसे अहम भूमिका गुरु की ही होती है। गुरु ही व्यक्ति को तराश कर इस लायक बनाता है कि वह समाज और राष्ट्र के लिए उपयोगी बने। विभागाध्यक्ष डॉ. विनोद कुमार चौधरी ने कहा कि परिवार के बच्चों का प्रारंभिक विद्यालय माना गया है। लेकिन, बच्चों को जीने का असली सलीका उसे शिक्षक ही सिखाते हैं। प्रारंभ में विभिन्न विभागों से पहुंचे विद्यार्थियों ने शिक्षकों की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि गुमनामी के अंधेरे में था पहचान बना दिया। गुरु की कृपा हुई मुझे इंसान बना दिया। छात्र चंद्रभूषण कुमार, अलका झा, कंचन कुमारी, संगम जी झा, राजेश्वर झा, प्रियंगम जी झा, रूही खातून, जयशंकर झा आदि ने भी अपने विचार रखे। संचालन डॉ. विद्यानाथ मिश्र ने किया। अतिथियों का स्वागत प्रो. गोपीरमण प्रसाद ¨सह ने किया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. मंजू झा ने की। मौके पर फाउंडेशन के सचिव मुकेश कुमार झा, अनिल कुमार ¨सह, नवीन कुमार, रवींद्र चौधरी, मोहन साह मौजूद थे।

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