विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 24, 2019 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

शंकरपुर डीह के सर्वेक्षण में मिले मृदभांड समेत कई पुरावशेष

By JagranEdited By:
Published: Wed, 24 Jul 2019 01:12 AM (IST)

ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग की ओर से जिला के महत्वपूर्ण पुरास्थलों के ...और पढ़ें

शंकरपुर डीह के सर्वेक्षण में मिले मृदभांड समेत कई पुरावशेष
शंकरपुर डीह के सर्वेक्षण में मिले मृदभांड समेत कई पुरावशेष

दरभंगा। ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग की ओर से जिला के महत्वपूर्ण पुरास्थलों के दो दिवसीय सर्वेक्षण कार्य मंगलवार को दूसरे दिन भी जारी रहा। इसमें विभाग के शोध छात्र एवं अन्य छात्र-छात्राओं ने भाग लिया। दूसरे दिन सर्वेक्षण के लिए दो टीमें बनाई गई। पहली टीम विभागाध्यक्ष डॉ. अयोध्यानाथ झा के नेतृत्व में प्राचीन राज्य मिथिला की राजधानी देवकुली, शंकरपुर डीह, महथावन व पिपरौलिया और दूसरी टीम कोलकाता विवि के डॉ. रजत सान्याल के नेतृत्व में केवटी के कोपगढ़ गई। विभागाध्यक्ष डॉ. झा, प्रो. सतीश चंद्र चौधरी, अभिमन्यु कुमार झा और पूर्णिमा कुमारी देवकुली स्थित मुरारी कुमार झा (पुरातत्व) के आवास पर पहुंचे, जहां उनलोगों ने उनके द्वारा किए गए पुरातात्विक अन्वेषणों और पुरावशेषों का निरीक्षण किया। फिर उनके साथ सभी लोग देवकुली स्थित बाबा वर्धमानेश्वर नाथ महादेव मंदिर पहुंचे जहां इस स्थल से प्राप्त सभी पुरावशेष रखे हुए हैं। यहां गणेश प्रतिमा, अष्टभुजी दुर्गा, सूर्य प्रतिमा और अन्य प्रस्तर खंडों का अवलोकन किया। प्रस्तर खंडों में एक प्रतिमा का स्टेला का टुकड़ा और एक बुद्ध प्रतिमा का निचला हिस्सा सहित एक स्तम्भ का टुकड़ा आदि है। यह स्थान ओइनिवार वंश के समय में मिथिला की राजधानी थी। इसी गांव से वर्ष 2018 को 4-5वीं शताब्दी का एक शिवलिग प्राप्त हुआ था जो महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय में है। यहां से टीम शंकरपुर डीह पहुंची। इस स्थल को स्थानीय लोग सकरी डीह के नाम से भी जानते हैं। यह वही स्थल है जिसकी खोज मुरारी कुमार झा ने 18 सितंबर 2015 को की थी। यहां से खेत जुताई के क्रम में जांता मिला था। पूर्व समय में यहां से कतिपय मृण मूर्तियों का विभिन्न स्वरूप और चांदी के सिक्के भी प्राप्त हो चुके हैं। सर्वेक्षण के दौरान छात्रा पूर्णिमा कुमारी की नजर एक पुरावशेष पर पड़ी जिसे विभागाध्यक्ष डॉ. झा ने ढक्कन बताया, जिसे बाहर निकाला गया। इसके अलावा एक कड़ाही का हैंडल, मशाल का ऊपरी हिस्सा, एक मुंगदर मिला सहित कई हड्डियों के अवशेष देखे गए। टीम यहां से महथावन और पिपरौलिया गई, जहां लेख युक्त विष्णु प्रतिमा और गणेश प्रतिमा का अवलोकन किया गया। सर्वेक्षण की समाप्ति के अवसर पर डॉ. रजत सान्याल ने कहा की इस तरह के अदभुत और अद्वितीय कार्यक्रम बिरले ही कोई विभाग आयोजित करता है। सर्वेक्षण के समाप्ति की घोषणा करते हुए विभागाध्यक्ष डॉ. झा ने कहा कि इस तरह का कार्यक्रम विभाग की ओर से पहली बार आयोजित किया गया है। इसके माध्यम से शोधकर्ताओं एवं विभागीय छात्र-छात्राओं को पुरास्थलों पर ही प्राचीनता को चिह्नित करने का कार्य सिखाया गया। पुरातत्व में स्तरीकरण की भूमिका पर प्रकाश डाला गया एवं विभिन्न स्तरों को अलग करना, उन्हें पहचानना और स्तर विन्यास का चित्रण करना सिखाया गया। धन्यवाद ज्ञापित करते हुए मुरारी कुमार झा ने कहा कि इस तरह के अनोखे कार्यक्रम विभाग को समय-समय पर आयोजित करते रहना चाहिए जिससे छात्र अद्यतन होते रहेंगे। समापन समारोह में विभाग के सभी छात्र-छात्राएं मौजूद रहे।

-------------------