दरभंगा। लनामिविवि के ¨हदी विभाग में शनिवार को इलाहाबाद विवि के पूर्व विभागाध्यक्ष तथा जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र कुमार ने उत्तर आधुनिकता और उत्तर आधुनिकतावाद विषय पर व्याख्यान दिया। कहा कि सामंत की सत्ता और धर्म की सत्ता ने मध्यकाल में तर्कशीलता को खत्म करके जिस तरह श्रद्धा और आस्था को केंद्र में ला खड़ा किया था, आधुनिकता ने विज्ञान के सहयोग से उसे मुक्त किया। तर्कशीलता के साथ आधुनिकता ने जो प्रवेश लिया उसके मूल्य समानता, स्वतंत्रता और विश्व बंधुत्व दिखे। पर जब दो विश्वयुद्धों को संसार ने झेला, तब यह स्पष्ट प्रतीत होने लगा कि यह विचारधारा भी अपर्याप्त है। आधुनिकता के मूल्यों से मोहभंग वस्तुत: विज्ञान को अतिरेकपूर्ण महत्त्व देने के कारण आया। इसी से पश्चिमी विद्वानों और दार्शनिकों ने एक नई विचारधारा के लिए कार्य किया। जो उत्तर आधुनिकता कहलाई। उत्तर आधुनिकता मूलत: विखंडन को साथ लेकर आई, जो वस्तुत: विनाश से निर्माण या अपर्याप्तता से पर्याप्त की ओर बढ़ने का प्रयत्न था। उनके मुहावरे ज्यादातर नकारात्मक या विरोधी युग्मों के रूप में आए। विरुद्ध के सामंजस्य की जगह विरुद्ध का द्वंद्व मूल्य बन गया। उत्तर आधुनिकता अंत की बात तो कहती है, पर केंद्र के वर्चस्व पर भी सवाल उठाकर हाशिए के लोगों के लिए विमर्श की भूमि तैयार करती है। सब कुछ मानने के कारण उत्तर आधुनिकता अर्थ की अनिश्चितता पैदा करती है, जो सही नहीं है। कुल मिलाकर इस विचारधारा में भी सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पक्ष है। कार्यक्रम का संचालन प्रभारी ¨हदी विभागाध्यक्ष डॉ. विजय कुमार ने किया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. सुरेंद्र प्रसाद सुमन ने किया। मौके पर दर्जनों छात्र-छात्राएं और शोध छात्र उपस्थित थे।

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