दरभंगा। शिक्षा का दान सर्वोत्तम सेवा है। संभव है कि इसमें मनोनुकूल आर्थिक उपार्जन न होता हो, फिर भी इससे आत्म संतुष्टि तो अवश्य मिलती है। शिक्षा के ऐसे दानवीर को भगवान भी संजीदगी से देखते हैं। मिथिलांचल को ज्ञान का डिस्ट्रीब्यूशन सेंटर है। भाषा से ही किसी संस्थान एवं संस्था की पहचान होती है। इसलिए संस्कृत जितनी ज्यादा विकसित होगी हमारी संस्कृति भी उतनी ही प्रखर व मजबूत होगी। कामेश्वर ¨सह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के ऐतिहासिक दरबार हाल में शनिवार को आयोजित संस्कृत सप्ताह समारोह के उदघाटन संबोधन में बेनीपुर के विधायक सुनील कुमार चौधरी ने उक्त बातें कही। उन्होंने कहा कि शिक्षक का स्थान समाज में बहुत ऊंचा है। इतिहास गवाह है कि जब कभी आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक व संस्थागत संकट एवं समस्याएं आती हैं तो शिक्षकों की भूमिका सबसे ज्यादा बढ़ जाती है। आज भी हम सभी का सांस्कृतिक क्षरण तेजी से हो रहा है। इसलिए गुरुवरों व प्राध्यापकों से विनम्र निवेदन होगा कि इस माया जाल से समाज को बाहर निकालें एवं उचित रास्ता भी दिखाएं। उन्होंने स्वीकार किया कि देववाणी संस्कृत को एक विशेष वर्ग के साथ सीमित कर दिया गया है। इस क्षेत्र के शिक्षकों को उचित सम्मान एवं वेतन नहीं मिल पा रहा है। संस्कृत को बढ़ावा देने के लिए हर संभव मदद की बात की। कहा कि वे इतिहास के छात्र रहे हैं। इसलिए हमेशा भूतकाल से सीख लेकर वर्तमान संवारने का काम करते रहे हैं। इसी मिथिलांचल से आते भी हैं। जो कहते हैं वो करके दिखाते हैं। सभी स्तरों पर साथ चलने को तैयार हैं, आप कभी आजमा कर तो देखिए।

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संस्कृत को ले आज संकल्पों का दिन : वीसी

अध्यक्षीय संबोधन में कुलपति प्रो. सर्व नारायण झा ने कहा कि आज का दिन संकल्पों का दिन है। खासकर शिक्षक, छात्र एवं गवेषक संकल्पित होकर संस्कृत व संस्कृति की जीवंतता के लिए कार्य करें। यहां संभावनाएं अनेक हैं। सिर्फ व सिर्फ उसे निखारने की जरूरत है। वीसी ने नवागुंतक शिक्षकों के बीच ग्रहस्पष्टीकरणम विषय पर हुए सफल शास्त्रार्थ पर हर्ष व्यक्त किया और श्लोक पढ़ कर कहा कि बच्चे भी कुशल विद्वान हो सकते हैं। उन्होंने नियमित रूप से शास्त्रार्थ जारी रखने की बात कही। आज के शास्त्रार्थी थे उत्तर पक्ष से वरुण कुमार झा एवं पूर्व पक्ष से विकास। दोनों ज्योतिष के शिक्षक हैं।

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वैज्ञानिक भाषा है संस्कृत : प्रोवीसी : प्रोवीसी प्रो. चन्द्रेश्वर प्रसाद ¨सह ने कहा कि संस्कृत को महज पूजा- पाठ व कर्मकांड की भाषा समझना आज के दौर में सबसे बड़ी भूल होगी। संस्कृत देववाणी होकर भी विज्ञान की भाषा है। संस्कृत के अनुरागियों से उन्होंने अपील करते हुए कहा कि समय आ गया है इसे विज्ञान से जोड़कर ही व्यापकता मिल सकती है। खुशी की बात है कि हमारे कुलपति इस ओर अग्रसर भी हैं और छात्रों के साथ गवेषकों को वे ऐसा करने में उत्साहित भी कर रहे हैं। प्रोवीसी ने कहा कि विदेशों में संस्कृत शिक्षा के प्रति एक गजब का नव उत्साह देखा जा रहा है। अब हमें भी संकल्पित होकर इस मामले में नया करना होगा। तभी संस्कृत समृद्ध होगी और जनमानस में पैठ कर चुकी गलत अवधारणाएं निर्मूल होंगी।

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संस्कृत के तीन विद्वान हुए सम्मानित :

संस्कृत सप्ताह दिवस पर दरबार हॉल में तीन विद्वानों को सम्मानित किया गया। ऐसे विद्वानों में उजान धर्मपुर निवासी साहित्य के पुरोधा आचार्य डॉ. रामजी ठाकुर, सरिसव-पाही निवासी आचार्य शशि शेखर झा एवं करकौली निवासी ज्योतिषाचार्य देवानंद झा शामिल हैं। सभी विद्वानों ने अपने अनुभवों व विचारों को रखा। संचालन प्रो. शशिनाथ झा ने संचालन किया। कार्यक्रम में इसके पूर्व सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण के साथ वरुण कुमार झा एवं अखिलेश मिश्र ने मंगलाचरण प्रस्तुत किया गया। निशा, अनुपम,राखी, गुड्डी, वीणा, राजन, रंजय, चन्दन, दीपक, पंकज, श्यामनंदन एवं भवेश ने मिलकर कुलगीत गया। स्वागत भाषण डॉ. विद्येश्वर झा ने एवं धन्यवाद ज्ञापन डीन प्रो. शिवाकांत झा ने किया। दूसरे सत्र में क्वीज हुई। आयोजन समिति के संयोजक प्रो. श्रीपति त्रिपाठी, प्रो. सुरेश्वर झा, प्रो. चौठी सदाय, डॉ. दिलीप कुमार झा, डॉ. हरेंद्र किशोर झा, डॉ. विनय कुमार मिश्र, डॉ. पुरेन्द्र वारिक, डॉ. दयानाथ झा, डॉ. रामप्रवेश पासवान, डॉ. सत्यवान कुमार, डॉ. शैलेन्द्र मोहन झा, डॉ. तेजनारायण झा, पीआरओ निशिकांत

समेत सभी कर्मी मौजूद थे। तकनीकी व्यव्यस्था की जिम्मेदारी सूचना वैज्ञानिक नरोत्तम मिश्रा के साथ पवन सहनी व सतीश कुमार ने निभाई।

Posted By: Jagran