दरभंगा । विवाह पंचमी के अवसर पर शनिवार को अंतरराष्ट्रीय सिद्धाश्रम साधक परिवार की ओर से हराही पोखर स्थित रेलवे सामुदायिक भवन में सदगुरुदेव कैलाशचंद्र श्रीमाली ने कहा कि श्रृष्टि का मूल आधार ब्रह्म और माया को ही माना गया है। ज्ञान और अज्ञान के आधार पर ही संपूर्ण श्रृष्टि का क्रम चलता है। इससे स्पष्ट है कि जीवन श्रद्धा, विश्वास और कर्मशीलता से ही गतिमान है। त्रिशक्ति कंकाली कहती हैं कि मैं ही बुद्धि हूं, श्री, धृति, कीर्ति, मति, श्रद्धा, पिपासा, निद्रा, तंद्रा मैं ही हूं। संसार में ऐसा कुछ नहीं है, जिसमें मेरी शक्ति का भाव नहीं। जो कुछ भी लक्षित होता है, सब मेरे ही शक्ति स्वरूप में है। मैं ही समस्त देवताओं के रूप में विभिन्न नामों में स्थित हूं और शक्ति रूप में पराक्रम करती हूं। मैं ही गौरी, ब्राह्मी, रौद्री, वाराही, वैष्णवी, शिखा स्वरूपा शक्ति हूं। कहा कि मर्यादा पुरूषोतम श्रीराम का संपूर्ण जीवन प्रेरणा स्वरूप है। 14 वर्ष के वनवास की कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने धैर्यवान, ओजस्वी, तेजस्वी व्यक्तित्व का परिचय देते हुए एक आज्ञाकारी बेटे का कर्तव्य निभाया। धर्म के अनुरूप विश्वामित्र, वशिष्ठ जैसे श्रेष्ठतम गुरूजनों के सानिध्य में जीवन के सभी सोपानों में श्रेष्ठता से युक्त हो सके, जिसके फलस्वरूप उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कहा गया। भगवान श्रीराम का जीवन करूणा, दया और बिना किसी भेदभाव के प्राणी मात्र के महत्व और कल्याण का मार्ग है। हनुमान जैसे सामान्य वानर को भी शिष्य रूप में स्वीकार कर जन-जन में पूजनीय बना दिया। अहिल्या को अपने चरण कमल की धूल से अभिशाप मुक्त किया। कहा कि गुरु द्वारा ही जीवन को सदमार्ग की प्राप्ति होती है। मौके पर भारी संख्या में श्रद्धालु मौजूद थे।

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Posted By: Jagran