टेक्सास की नौकरी छोड़ी, मखाना की खेती थामी, बिहार से अब दुनिया तक पहुंचा रहे मिथिला का मखाना
राजीव रंजन ने टेक्सास में अपनी इंजीनियर की नौकरी छोड़कर मिथिला के मखाना किसानों के उत्थान का बीड़ा उठाया। उनके ...और पढ़ें

मखाना की छटाई करतीं महिला किसान। सौजन्य-स्वयं
HighLights
इंजीनियर राजीव रंजन ने टेक्सास की नौकरी छोड़ मखाना खेती चुनी।
उनके प्रयासों से मखाना जी-20 शिखर सम्मेलन में शामिल हुआ।
मनीगाछी एफपीसी के जरिए 5 लाख किसानों को जोड़ने का लक्ष्य।
विनय कुमार, दरभंगा। कंप्यूटर साइंस इंजीनियर की नौकरी से मखाना की खेती तक का सफर आसान नहीं था। राजीव रंजन ने टेक्सास में कंप्यूटर इंजीनियर के रूप में करियर की शुरुआत की थी।
वर्ष 2013 के पासआउट राजीव ने कुछ अलग करने के जज्बे में टेक की दुनिया छोड़ मखाना की खेती और किसानों के लिए काम करने का रास्ता चुना। आज वह मिथिला के मखाने को देश-दुनिया तक पहुंचाने के अभियान में जुटे हैं।

नौकरी छोड़ी, किसानों के बीच पहुंचे
मखाना किसानों के लिए कुछ करने के उद्देश्य से राजीव ने दरभंगा से दालकोला तक की यात्रा की। इस दौरान उन्होंने छह जिलों का भ्रमण किया और कई मखाना किसानों से मिले। किसानों से बातचीत कर उनकी समस्याओं, तकनीकी समझ और मखाना उत्पादन के तौर-तरीकों की जानकारी जुटाई।
इसी दौरान उनके मन में मखाना किसानों की जिंदगी बेहतर बनाने का विचार आया। उन्होंने मखाना से जुड़े 14.38 लाख किसानों के लिए काम करने का संकल्प लिया।
मखाना पर शुरू किया अनुसंधान
राजीव ने मखाना को लेकर अनुसंधान शुरू किया। इस दौरान आइसीएआर नई दिल्ली के डीडीजी डा. श्याम नारायण झा, डा. आरके विश्वकर्मा, सीफेट लुधियाना के डा. नचिकेता और एनआरसी मखाना दरभंगा के डा. इंदु शेखर सिंह का मार्गदर्शन मिला।
मखाना को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने तत्कालीन आत्मा दरभंगा के परियोजना अधिकारी पूर्णेंदु झा से भी संपर्क किया। पूर्व डीएओ संजय कुमार सिंह ने भी उनके प्रयासों को आगे बढ़ाने में सहयोग किया।

280 से 1200 रुपये किलो तक पहुंचा भाव
इन प्रयासों के बाद राजीव मखाना को दिल्ली तक ले गए। उनके अनुसार, एक साल में मखाना की कीमत 280 रुपये से बढ़कर 1200 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई।
आठ बार खारिज हुआ प्रस्ताव
मखाना को देश-दुनिया के बड़े मंच पर पहुंचाने की उनकी कोशिश भी आसान नहीं रही। 27 दिसंबर 2022 को उन्होंने मखाना को जी-20 बैठक में रखने के लिए वाणिज्य मंत्रालय को ईमेल किया। 17 जनवरी 2023 को उन्हें जवाब मिला।
इसके बाद वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के पीएस आनंद भास्कर ने उन्हें मंत्री से मिलने के लिए दिल्ली बुलाया। जी-20 के सुषमा स्वराज भवन में सम्मेलन प्रभारी कर्नल विवेक आर्य के ओएसडी जेएस आर. रमेश बाबू के स्तर पर उनका प्रस्ताव आठ बार खारिज हुआ।
काजू की जगह जी-20 की मेज पर पहुंचा मखाना
लगातार प्रयास के बाद 24 अगस्त 2023 को जी-20 समिट में काजू की जगह मखाना रखने पर सहमति बनी। इस उपलब्धि के लिए उन्हें विदेश मंत्रालय की ओर से प्रशंसा पत्र मिला। वर्ष 2024 में कृषि मंत्रालय के आइसीएआर की ओर से उन्हें सर्वश्रेष्ठ कृषि उद्यमियों का पुरस्कार भी दिया गया।
मनीगाछी में बना एफपीसी
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की जेएस मनिंदर कौर के मार्गदर्शन में सितंबर 2023 में दरभंगा के मनीगाछी में एफपीसी का गठन किया गया। इसके तहत अभी तक 853 लोगों ने रजिस्ट्रेशन कराया है, जबकि करीब 2700 लोग इससे जुड़ चुके हैं।
पांच लाख लोगों को जोड़ने का सपना
राजीव रंजन का लक्ष्य मनीगाछी एफपीसी को दुनिया के सफल मॉडल एफपीसी के रूप में विकसित करना है। आने वाले समय में वह इससे पांच लाख लोगों को जोड़ना चाहते हैं। उनका प्रयास मखाना किसानों को तकनीक, बाजार और बेहतर मूल्य से जोड़कर उनकी आय और जीवनस्तर में सुधार लाना है।
दो साल में एफपीसी के महत्वपूर्ण काम
- जी 20 में मखाने को तमाम राष्ट्र प्रमुखों के टेबल पर रखवाना।
- मखाना से बना 17 नए उत्पाद को मखाना उद्योग जगत को देना।
- विदेश मंत्रालय से मान्यता प्राप्त होना और प्रशंसा पत्र लेना।
- कृषि किसान कल्याण मंत्रालय से वर्ष 2024 के कृषि उद्यमी पुरस्कार लेना।
- वर्ल्ड फूड इंडिया 2023 और 2024 में मखाना को शोकेस करना।
- आईआईटीएफ 2024 में कृषि मंत्रालय और वाणिज्य मंत्रालय की ओर से स्टाल लगाना।
- 32वें अंतरराष्ट्रीय कृषि व आर्थिक विकास परिषद सम्मेलन में मखाना को शोकेस करना।
- महाकुंभ प्रयागराज में केंद्रीय कृषि मंत्रालय की ओर से मखाना को शोकेस करना।
- 26 जनवरी गणतंत्र दिवस समारोह में राष्ट्रपति के विशेष अतिथि के तौर पर 20 मखाना किसानों को बुलावा देना।
