45 लाख रुपये खर्च, फिर भी चादर नसीब नहीं; DMCH में ट्राली पर घूम रहा संक्रमण
डीएमसीएच दरभंगा में मरीजों को बिना चादर वाली ट्रॉलियों पर ले जाया जा रहा है, जिससे संक्रमण का खतरा बढ़ ...और पढ़ें

डीएमसीएच इमरजेंसी विभाग में वाहन से बिना चादर की ट्राली पर मरीज को उतारते स्वजन व कर्मी। जागरण।
HighLights
डीएमसीएच में बिना चादर की ट्रॉलियों से मरीजों को संक्रमण का खतरा।
चादरों की धुलाई पर प्रतिमाह 45 लाख रुपये का भारी खर्च।
मरीजों को चादरें उपलब्ध न होने से अस्पताल व्यवस्था पर सवाल।
राजकुमार गणेशन, दरभंगा। जिस ट्राली पर खून से लथपथ दुर्घटनाग्रस्त मरीज को इमरजेंसी कक्ष में पहुंचाया जा रहा, बिना सफाई या चादर बिछाए उसी पर अन्य मरीज को लिटा दिया जा रहा।
किसी को हार्ट अटैक हुआ तो कोई बर्न का केस। किसी को आपरेशन के बाद सामान्य वार्ड या आइसीयू में शिफ्ट किया जा रहा। प्रसव के बाद जच्चा-बच्चा को भी...। मतलब ये है, बिना चादर की ट्राली पर संक्रमण पूरे अस्पताल में घूम रहा।
डीएमसीएच (दरभंगा मेडिकल कालेज एवं अस्पताल) में हर महीने बेड और ट्राली पर बिछाई जाने वाली चादर की धुलाई पर मोटी रकम खर्च हो रही है। लेकिन, मरीजों के लिए इसकी उपलब्धता लगभग शून्य है।
इमरजेंसी में आनेवाले घायल या अन्य मरीजों को एंबुलेंस से उतार कर सीधे चादर विहीन ट्राली पर लिटाकर कर्मी परीक्षण कक्ष तक पहुंचा देते हैं। एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड आदि जांच और विभिन्न विभागों में शिफ्टिंग बिना चादर वाली ट्राली के माध्यम से हो रही है।
ऐसा ही परीक्षण कक्ष के टेबल पर हो रहा है। वार्ड कर्मी स्टोर में चादर उपलब्ध नहीं होने की बात कहकर निकल जाते हैं। उन्हें इससे कोई मतलब नहीं कि किस मरीज को क्या बीमारी है और इस लापरवाही से उन्हें संक्रमण का खतरा है।
मरीज या घायलों के साथ आए कुछ स्वजन जागरूक होते हैं तो ट्राली मैन से चादर बिछाने की मांग करते हैं, नहीं मिलने पर हो-हंगामा होता है। ऐसा नहीं कि इससे समाधान निकल आता, उन्हें इसी व्यवस्था में रहकर उपचार कराना पड़ता है। यह हर रोज की तस्वीर है।
पटना में होती चादर, कंबल समेत अन्य कपड़ों की धुलाई
डीएमसीएच में चादर, कंबल, तकिया कवर, आपरेशन थिएटर में इस्तेमाल होने वाले कपड़ों की धुलाई के लिए एजेंसी के तौर पर जीविका संगठन को जिम्मेदारी मिली है।
सफाई या धुलाई के लिए अस्पताल परिसर में लांड्री नहीं है, जिसकी वजह से कपड़े धुलाई के लिए पटना स्थित एनएमसीएच भेजे जाते हैं। इनकी धुलाई पर प्रतिमाह करीब 45 लाख से अधिक खर्च तो हो रहा, लेकिन सुविधा हजार की भी नहीं है।
अधिक खर्च होने की चर्चा विधानसभा में भी केवटी विधायक डा. मुरारी मोहन झा कर चुके हैं। बावजूद व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं हुआ। अस्पताल के कपड़ों को वार्डों से उठाकर पटना भेजने और लाने के कार्य में वाहन सहित आठ से दस कर्मी कार्यरत हैं।
तीन दिन में किसी ने नहीं बदली चादर तो घर से ले आए डीएमसीएच में सतरंगी चादर योजना भी फेल है। विभिन्न वार्डों में 1050 बेडों पर अलग-अलग रंगों की बिछी चादर देखकर ही समझा जा सकता है।
सतरंगी योजना के तहत रविवार को बेड पर बैगनी, सोमवार को नीली, मंगलवार को आसमानी, बुधवार को हरी, गुरुवार को पीली, शुक्रवार को नारंगी और शनिवार को लाल रंग की चादर बिछानी है, इत्तेफाक से किसी रोज दिन के अनुसार चादर बिछ जाए, नहीं तो बेडों पर चादरों का इंद्रधनुष ही नजर आता है।
मेडिसिन वार्ड में बहेड़ी के मरीज के स्वजन राम आधार साह, एमसीएच (मदर एंड चाइल्ड अस्पताल) में सदर प्रखंड की रेणु देवी और आर्थोपेडिक वार्ड में मुकेश कुमार बताते हैं कि तीन दिनों से उनके स्वजन का उपचार चल रहा है।
इमरजेंसी से वार्ड में शिफ्ट होने पर एक चादर मिली थी। तीन दिनों के अंतराल में उसे बदलने कोई नहीं आया। घर से लाई हुई चादर बिछाए हैं। ये है अस्पताल की व्यवस्था...!
ट्राली के लिए अलग से व्यवस्था नहीं
अस्पताल में बेड पर चादर बिछाने की जिम्मेदारी सिस्टर इंचार्ज और वार्ड ब्वाय की है। ट्राली के लिए अलग से व्यवस्था नहीं है। सिस्टर इंचार्ज द्वारा चार-पांच चादर ही उपलब्ध कराई जाती है।
इमरजेंसी में तैनात ट्रालीमैन इसे नाकाफी बताते हैं। उनका कहना है कि इमरजेंसी में रोजाना करीब 200 से अधिक मरीज पहुंचते हैं। एक मरीज को शिफ्ट करने के बाद चादर हटाकर दूसरी बिछाने का नियम है।
इसके लिए हर रोज कम से कम 200 चादर की आवश्यकता है, लेकिन मिलती कितनी है...चार से पांच! यह तो अस्पताल प्रबंधन को सोचना, समझना चाहिए।
मरीजों के स्वजन हमलोगों से उलझ जाते हैं, चार-पांच चादरों में हम क्या करेंगे? किसे दें, किसे नहीं। जैसे मेन स्टोर से सिस्टर इंचार्ज के नाम से चादर इश्यू की जाती है, उसी तरह ट्राली सुपरवाइजर को जरूर के हिसाब से चादर आवंटित होनी चाहिए। ट्रालीमैन की सीधी जबावदेही तय होने पर व्यवस्था में सुधार संभव है।
ट्राली पर चादर का बिछा होना अनिवार्य है। इसके लिए नियमित व्यवस्था बनी है। अगर ऐसा नहीं हो रहा तो जांचकर दोषी कर्मियों पर कार्रवाई की जाएगी।
-डा. अमित कुमार, उपाधीक्षक डीएमसीएच।
