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दरभंगा में नदी ने घर छीने, तटबंध पर कट रही जिंदगी, 10 साल बाद भी नहीं मिला बसेरा

Published: Wed, 20 May 2026 06:41 PM (IST)

दरभंगा के कुशेश्वरस्थान में कमला बलान नदी के कटाव से विस्थापित 143 परिवार पिछले 10 सालों से तटबंध पर नारकीय ...और पढ़ें

तटबंध पर बसे भरैन मुशहरी के विस्थापित एवं जमीन दखल कब्जा दिलाने की प्रत्याशा में पर्चा धारी महिलाएं। जागरण

तटबंध पर बसे भरैन मुशहरी के विस्थापित एवं जमीन दखल कब्जा दिलाने की प्रत्याशा में पर्चा धारी महिलाएं। जागरण

HighLights

  1. 143 परिवार 10 साल से तटबंध पर विस्थापित जीवन जी रहे।

  2. बुनियादी सुविधाओं का अभाव, नारकीय हालात में गुजर बसर।

  3. जमीन के पर्चे मिले पर दबंगों का कब्जा, पुनर्वास अटका।

अरुण कुमार राय, कुशेश्वरस्थान (दरभंगा) । कहते हैं परेशानियां चाहे कैसी भी हो एक समय बाद उसका समाधान होता ही है। यहां दिन, महीने, साल क्या दशक बीत गए। न परिस्थितियां बदलीं ना हालात। अच्छे दिन के इंतजार में आंखें पथरा गईं।

धौर्य जबाव दे गया, लेकिन जिम्मेदारों को अपने दायित्व का बोध तक नहीं हुआ। कमला बलान नदी के कटाव से उजड़े पूर्वी प्रखंड के भरैन मुशहरी और चौकीया गांव के 143 विस्थापित परिवार पिछले 10 वर्षों से पश्चिमी तटबंध पर झोपड़ियों में नारकीय जीवन जी रहे हैं। आज तक न तो इनके पुनर्वास की स्थायी व्यवस्था हो सकी और न ही बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकी हैं।

वर्ष 2015 में कमला बलान के पश्चिमी तटबंध निर्माण के बाद सुघराईन पंचायत के भरैन मुशहरी के 104 तथा इटहर पंचायत के चौकीया गांव के 39 परिवारों के घर नदी की तेज धार में समा गए।

घर उजड़ने के बाद ये लोग तटबंध पर शरण लेने को मजबूर हो गए। तब से ये झोपड़ियां बनाकर किसी तरह जीवन गुजार रहे हैं। सितंबर 2025 में अंचल प्रशासन द्वारा तीन-तीन डिसमिल जमीन का पर्चा मिलने पर इनमें पुनर्वास की उम्मीद जगी थी।

लेकिन, नौ माह बीत जाने के बाद भी प्रशासन पर्चाधारियों को जमीन पर कब्जा तक नहीं दिला सका है। पर्चा वाली जमीन पर गांव के दबंगों का कब्जा है।

अभाव और डर के साय में गुजर रही जिंदगी

भरैन मुशहरी में 104 परिवारों के लिए मात्र दो तथा चौकिया में 39 परिवारों के लिए एक चापाकल ही पेयजल का सहारा है। बिजली, सड़क, शौचालय और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाएं नदारद हैं।

शाम ढलते ही पूरा तटबंध अंधेरे में डूब जाता है। मोमबत्ती के सहारे रात कटती है। बच्चों को नदी पार कर गांव के स्कूल में पढ़ने जाना पड़ता है। बरसात में यह सफर बच्चों के लिए जानलेवा साबित होता है।

बीमार होने पर करीब सात किलोमीटर दूर कुशेश्वरस्थान बाजार स्थित सीएचसी जाना पड़ता है। ग्रामीण पार्वती देवी, रूपम देवी, शीशम देवी, मीरा देवी और सोनिया देवी ने बताया कि वर्षों की लड़ाई के बाद जमीन का पर्चा तो मिला, लेकिन आज तक बसने का अधिकार नहीं मिला।

प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ भी नहीं दिया गया है। तटबंध पर जंगली जानवर और सांप-बिच्छु का डर बना रहता है। रातभर परिवार के बड़े सदस्य बच्चों की सुरक्षा के लिए जागते हैं।

पूर्व के अंचल प्रशासन ने मामले को गंभीरता से नहीं लिया। वर्ष 2024 में आए भीषण बाढ़ के दौरान सांसद तथा तत्कालीन ग्रामीण विकास मंत्री ने क्षेत्र का दौरा किया था। अंचल प्रशासन को विस्थापितों के लिए जमीन उपलब्ध कराकर पुनर्वास की व्यवस्था करने को कहा। इसके बाद अंचल प्रशासन सक्रिय हुआ और सरकारी जमीन तलाश कर सभी विस्थापित को तीन-तीन डिसमिल जमीन का पर्चा निर्गत किया गया। अब पर्चाधारियों को पीएम आवास योजना से मकान बनाकर दिया जाएगा।
-गोपाल पासवान, अंचलाधिकारी, कुशेश्वरस्थान पूर्वी।