दरभंगा में सिस्टम फेल, फाइलों में कैद हुआ दाखिल-खारिज, 15 हजार लोग परेशान
दरभंगा सदर अंचल कार्यालय में प्रशासनिक शिथिलता के कारण 15,000 से अधिक दाखिल-खारिज और परिमार्जन के मामले लंबित हैं। नियमित ...और पढ़ें

इसमें प्रतीकात्मक तस्वीर लगाई गई है।
जागरण संवाददाता, दरभंगा। बिहार सरकार के तमाम दावों के बावजूद दरभंगा सदर अंचल कार्यालय में प्रशासनिक शिथिलता के कारण आम जनता बेहाल है। स्थिति यह है कि दाखिल-खारिज (म्यूटेशन) और परिमार्जन के 15,000 से अधिक मामले धूल फांक रहे हैं, जबकि आवेदनकर्ता अंचल कार्यालय और संबंधित अधिकारियों की चौखट पर चक्कर लगाने को मजबूर हैं।
डोंगल के खेल में फंसी जनता
हाल ही में जिला बंदोबस्त पदाधिकारी सुरेश पासवान को सदर अंचल का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया था। शुरुआत में कार्य निष्पादन न होने का कारण पटना से डोंगल एक्टिवेट न होना बताया गया।
हालांकि, जब तकनीकी बाधाएं दूर हुईं और डोंगल एक्टिवेट हो गया, तब भी समस्या का समाधान नहीं हुआ। प्रभार संभाल रहे सीओ ने स्पष्ट रूप से कार्य निष्पादन से इनकार कर दिया है।
उनका तर्क है कि जब तक किसी नियमित अंचल अधिकारी (सीओ) की नियुक्ति नहीं हो जाती, तब तक दाखिल-खारिज और परिमार्जन की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाएगी।
कार्यालयों में ताले, कर्मचारी नदारद
गुरुवार को सदर अंचल कार्यालय में अफरातफरी का माहौल देखा गया। सैकड़ों लोग दूर-दराज से इस उम्मीद में आए थे कि सीओ साहब से मिलकर उनकी समस्याओं का समाधान होगा, लेकिन सीओ और राजस्व कर्मचारी दोनों ही कार्यालय से नदारद रहे।
गौरतलब है कि सदर अंचल के अंतर्गत कुल 12 राजस्व हल्का कार्यालय आते हैं, लेकिन वर्तमान में इन सभी कार्यालयों में ताले लटके हुए हैं।
राजस्व कर्मचारियों की तकनीकी अड़चन
प्रशासनिक विफलता का आलम यह है कि राजस्व हल्का कर्मचारी दिनेश कुमार और सुधांशु कुमार का डोंगल अभी तक एक्टिवेट नहीं किया गया है। बिना डिजिटल सिग्नेचर (डोंगल) के ऑनलाइन आवेदनों पर आगे की कार्रवाई तकनीकी रूप से असंभव है।
एक तरफ सरकार राजस्व कार्यों में पारदर्शिता के लिए डिजिटल प्रणाली पर जोर दे रही है, वहीं दूसरी तरफ अधिकारियों की आपसी खींचतान और पद की रिक्तता के कारण हजारों लोग अपने जमीन के कागजों के लिए दर-दर भटक रहे हैं।"
कुल लंबित मामले: 15,000+ (दाखिल-खारिज और परिमार्जन)।
हल्का कार्यालय: सभी 12 कार्यालयों में कार्य पूरी तरह बंद।
मुख्य कारण: नियमित सीओ का अभाव और कर्मचारियों के डोंगल एक्टिवेशन में देरी। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इस गंभीर मामले में क्या संज्ञान लेता है और कब तक आम जनता को इस मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना से मुक्ति मिलती है।
