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दरभंगा में मृत्युभोज का बहिष्कार, मां की याद में 2100 पौधे लगाकर पेश की नई मिसाल

Published: Mon, 03 Aug 2026 06:45 PM (IST)

दरभंगा के एक परिवार ने मृत्युभोज की जगह मां की याद में पौधे लगाकर पर्यावरण संरक्षण का अनूठा संदेश दिया ...और पढ़ें

पौधों का वितरण करते स्वजन। सौ. स्वजन।

पौधों का वितरण करते स्वजन। सौ. स्वजन।

HighLights

  1. दरभंगा परिवार ने मृत्युभोज की जगह 2100 पौधे लगाए।

  2. मां रत्नी देवी की स्मृति में हरित श्रद्धांजलि दी गई।

  3. यह पहल सामाजिक बदलाव और पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक बनी।

संवाद सहयोगी, सिंहवाड़ा (दरभंगा)। किसी अपने को अंतिम विदाई देने के कई तरीके हो सकते हैं, लेकिन दरभंगा के एक परिवार ने ऐसी मिसाल पेश की, जिसने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया।

मृत्युभोज पर खर्च करने के बजाय परिवार ने 2100 पौधे लगाकर और बांटकर मां को श्रद्धांजलि दी, साथ ही पर्यावरण संरक्षण का ऐसा संदेश दिया, जिसकी पूरे इलाके में चर्चा हो रही है।

मृत्युभोज की जगह चुनी हरित श्रद्धांजलि

सिंहवाड़ा प्रखंड के विश्वनाथपट्टी गांव में स्व. रत्नी देवी की द्वादशा पर परिवार ने परंपरागत मृत्युभोज का आयोजन नहीं किया।

इसके बजाय 'हरित श्रद्धांजलि' कार्यक्रम के तहत 2100 पौधों का रोपण और वितरण किया गया। कार्यक्रम में पहुंचे लोगों को सादा भोजन कराया गया और विदाई के समय प्रत्येक अतिथि को एक पौधा भेंट किया गया।

मां की याद को बनाया हरियाली का संकल्प

ग्लोबल ग्रीन मिशन के संस्थापक एवं पर्यावरण प्रेमी संजय कुमार कुशवाहा की 94 वर्षीय माता रत्नी देवी का 22 जुलाई 2026 को निधन हुआ था।

परिवार ने श्राद्ध, पिंडदान और हवन सहित सभी धार्मिक अनुष्ठान परंपरागत रीति से संपन्न कराए, लेकिन मृत्युभोज के स्थान पर पौधरोपण का निर्णय लिया। संजय ने बताया कि उनकी मां को पौधों से विशेष लगाव था, इसलिए उनकी स्मृति में पौधे लगाना ही सबसे बड़ी श्रद्धांजलि है।

2100 पौधे बनेंगे भविष्य की धरोहर

संजय कुमार कुशवाहा ने कहा कि कार्यक्रम में लगाए और वितरित किए गए 2100 पौधे आने वाले वर्षों में पर्यावरण संरक्षण के साथ समाज के लिए भी उपयोगी साबित होंगे। उनका मानना है कि किसी प्रियजन की स्मृति को जीवित रखने का इससे बेहतर तरीका नहीं हो सकता।

सामाजिक दबाव से ऊपर उठकर लिया फैसला

रत्नी देवी के बड़े पुत्र विजय प्रसाद ने कहा कि परिवार ने सामाजिक दबाव की परवाह किए बिना मृत्युभोज का बहिष्कार किया। उनका कहना है कि एक दिन के भोज पर होने वाले खर्च की अपेक्षा पौधरोपण समाज और आने वाली पीढ़ियों के लिए कहीं अधिक लाभकारी है। इस पहल को उन्होंने जनजागरूकता अभियान का रूप देने का प्रयास बताया।

लोगों ने की पहल की सराहना

समस्तीपुर से पहुंचे सामाजिक कार्यकर्ता राजेश कुमार सुमन ने कहा कि भोजन कुछ घंटों तक याद रहता है, जबकि पौधे वर्षों तक ऑक्सीजन, छाया और फल देकर समाज की सेवा करते हैं। वहीं ललित कुमार ने इसे पूरे देश में अपनाए जाने योग्य पहल बताया।

कार्यक्रम में मीणा सिन्हा, सिंधु कुमारी, राज कमल, नील कमल, प्रभात कमल, प्रभाष कमल, अजीत कुमार कुशवाहा, कृति शिखा, आचार्य ललित शास्त्री, रत्न बिहारी पासवान, श्याम कुमार कुशवाहा, बसंत कुमार, देवेंद्र महतो, रामबाबू सिंह सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद रहे।

समाज के लिए प्रेरणा बनी पहल

विश्वनाथपट्टी गांव की यह पहल केवल एक परिवार की भावनात्मक श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि सामाजिक सोच में बदलाव का संदेश भी है। यह उदाहरण बताता है कि धार्मिक परंपराओं का सम्मान करते हुए भी सामाजिक कुरीतियों से दूरी बनाई जा सकती है।

यदि मृत्युभोज की जगह पौधरोपण जैसी पहल को बढ़ावा मिले, तो यह पर्यावरण संरक्षण के साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक अमूल्य विरासत साबित हो सकती है।