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बच्चों का ध्यान भटकना और अतिसक्रियता होगी नियंत्रित? मिथिलांचल के चिकित्सक के शोध ने जगाई उम्मीद

Published: Mon, 05 Oct 2026 07:00 AM (IST)

मिथिलांचल के एक चिकित्सक के शोध ने एडीएचडी के उपचार में नई उम्मीद जगाई है। इस अध्ययन में ब्राह्मी और ...और पढ़ें

डा. उद्भव मिश्रा की फाइल फोटो। सौ. स्वयं

डा. उद्भव मिश्रा की फाइल फोटो। सौ. स्वयं

HighLights

  1. मिथिलांचल के चिकित्सक का एडीएचडी उपचार पर नया शोध।

  2. ब्राह्मी और पिरासिटाम के संयुक्त प्रयोग से बच्चों में सुधार।

  3. अध्ययन में ध्यान केंद्रित करने और अतिसक्रियता में कमी देखी गई।

मुकेश कुमार श्रीवास्तव, दरभंगा । बढ़ती उम्र के साथ भूलने की समस्या को अक्सर सामान्य मान लिया जाता है। लेकिन बार-बार एक ही बात भूलना, परिचित लोगों को पहचानने में परेशानी, रोजमर्रा के काम करने में कठिनाई या व्यवहार में लगातार बदलाव अल्जाइमर रोग के संकेत हो सकते हैं।

वर्तमान में अल्जाइमर का पूर्ण इलाज या इसे पूरी तरह ठीक करने का कोई तरीका नहीं है। ऐसे में विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर मिथिलांचल के लिए एक शोध सुखद उम्मीद लेकर आया है।

अमेरिकी ओपन जर्नल आफ पीडियाट्रिक्स में प्रकाशित शोधपत्र में उन्होंने एडीएचडी (अटेंशन-डेफिसिट/हाइपरएक्टिविटी डिसआर्डर) पर आयुर्वेदिक औषधि ब्राह्मी (मोनिएरी) और एलोपैथिक दवा पिरासिटाम के संयुक्त प्रयोग का अध्ययन प्रस्तुत किया है।

शोध के अनुसार पांच से 10 वर्ष के 33 बच्चों को इसमें शामिल किया गया। छह माह तक उपचार के बाद बच्चों के ध्यान केंद्रित करने और अतिसक्रिय व्यवहार से जुड़े लक्षणों में सुधार का विवरण शोधपत्र में दिया गया है।

डा. मिश्रा के अनुसार अध्ययन के दौरान किसी गंभीर दुष्प्रभाव की जानकारी सामने नहीं आई। डा. मिश्रा ने बताया कि एकीकृत चिकित्सा पद्धति में उनकी रुचि पिता डा. मोहन मिश्रा से मिली प्रेरणा का परिणाम है।

डा. मोहन मिश्रा ने कालाजार जैसी बीमारी के उपचार की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया, जिसके लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया।

डा. उद्भव मिश्रा अपने पिता की शोध टीम के साथ वृद्धों में डिमेंशिया के उपचार में ब्राह्मी के चिकित्सीय उपयोग पर भी काम कर चुके हैं। इसी अनुभव के आधार पर बाल चिकित्सा क्षेत्र में यह अध्ययन किया गया।

एडीएचडी में बच्चों को ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई, अत्यधिक सक्रियता और आवेगपूर्ण व्यवहार जैसी समस्याएं हो सकती हैं। ये लक्षण पढ़ाई, सामाजिक व्यवहार और पारिवारिक जीवन को प्रभावित कर सकते हैं।

इसलिए समय पर चिकित्सकीय मूल्यांकन जरूरी है। डा. मिश्रा ने शोध की सीमाओं को भी स्पष्ट किया है। यह प्रारंभिक अध्ययन है और इसमें केवल बालकों को शामिल किया गया।

लिवर और किडनी जैसे महत्वपूर्ण अंगों की विस्तृत प्रयोगशाला जांच भी नहीं हुई। इसलिए उपचार की प्रभावशीलता और दीर्घकालिक सुरक्षा स्थापित करने के लिए बड़े स्तर पर बहुकेंद्रीय यादृच्छिक नियंत्रित परीक्षण (आरसीटी) की आवश्यकता है।